महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पौरानुगमनं चैव धर्मपुत्रस्य धीमतः ॥ १४३ ॥ जिस समय महात्मा पाण्डव वनवासके लिये यात्रा कर रहे थे, उस समय बहुत-से पुरवासी लोग बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरके पीछे-पीछे चलने लगे ॥ १४३ ॥ अन्नौषधीनां च कृते पाण्डवेन महात्मना । द्विजानां भरणार्थं च कृतमाराधनं रवेः ॥ १४४ ॥ महात्मा युधिष्ठिरने पहले अनुयायी ब्राह्मणोंके भरण-पोषणके लिये अन्न और ओषधियाँ प्राप्त करनेके उद्देश्यसे सूर्यभगवान्की आराधना की ॥ १४४ ॥ धौम्योपदेशात् तिग्मांशुप्रसादादन्नसम्भवः । हितं च ब्रुवतः क्षत्तुः परित्यागोऽम्बिकासुतात् ॥ १४५ ॥ त्यक्तस्य पाण्डुपुत्राणां समीपगमनं तथा । पुनरागमनं चैव धृतराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १४६ ॥ कर्णप्रोत्साहनाच्चैव धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः । वनस्थान् पाण्डवान् हन्तुं मन्त्रों दुर्योधनस्य च ॥ १४७ ॥ महर्षि धौम्यके उपदेशसे उन्हें सूर्यभगवान्की कृपा प्राप्त हुई और अक्षय अन्नका पात्र मिला। उधर विदुरजी धृतराष्ट्रको हितकारी उपदेश कर रहे थे, परंतु धृतराष्ट्रने उनका परित्याग कर दिया। धृतराष्ट्रके परित्यागपर विदुरजी पाण्डवोंके पास चले गये और फिर धृतराष्ट्रका आदेश प्राप्त होनेपर उनके पास लौट आये। धृतराष्ट्रनन्दन दुर्मति दुर्योधनने कर्णके प्रोत्साहनसे वनवासी पाण्डवोंको मार डालनेका विचार किया ॥ १४५—१४७ ॥ तं दुष्टभावं विज्ञाय व्यासस्यागमनं द्रुतम् । निर्याणप्रतिषेधश्च सुरभ्याख्यानमेव च ॥ १४८ ॥ दुर्योधनके इस दूषित भावको जानकर महर्षि व्यास झटपट वहाँ आ पहुँचे और उन्होंने दुर्योधनकी यात्राका निषेध कर दिया। इसी प्रसंगमें सुरभिका आख्यान भी है ॥ १४८ ॥ मैत्रेयागमनं चात्र राज्ञश्चैवानुशासनम् । शापोत्सर्गश्च तेनैव राज्ञो दुर्योधनस्य च ॥ १४९ ॥ मैत्रेय ऋषिने आकर राजा धृतराष्ट्रको उपदेश किया और उन्होंने ही राजा दुर्योधनको शाप दे दिया ॥ १४९ ॥ किर्मीरस्य वधश्चात्र भीमसेनेन संयुगे । वृष्णीनामागमश्चात्र पञ्चालानां च सर्वशः ॥ १५० ॥ इसी पर्वमें यह कथा है कि युद्धमें भीमसेनने किर्मीरको मार डाला। पाण्डवोंके पास वृष्णिवंशी और पांचाल आये। पाण्डवोंने उन सबके साथ वार्तालाप किया ॥ १५० ॥ श्रुत्वा शकुनिना द्यूते निकृत्या निर्जितांश्च तान् । क्रुद्धस्यानुप्रशमनं हरेश्चैव किरीटिना ॥ १५१ ॥
जब श्रीकृष्णने यह सुना कि शकुनिने जूएमें पाण्डवोंको कपटसे हरा दिया है, तब वे अत्यन्त क्रोधित हुए; परंतु अर्जुनने हाथ जोड़कर उन्हें शान्त किया ॥ १५१ ॥ परिदेवनं च पाञ्चाल्या वासुदेवस्य संनिधौ । आश्वासनं च कृष्णेन दुःखार्तायाः प्रकीर्तितम् ॥ १५२ ॥ द्रौपदी श्रीकृष्णके पास बहुत रोयी-कलपी। श्रीकृष्णने दुःखार्त द्रौपदीको आश्वासन दिया। यह सब कथा वनपर्वमें है ॥ १५२ ॥ तथा सौभवधाख्यानमत्रैवोक्तं महर्षिणा । सुभद्रायाः सपुत्रायाः कृष्णेन द्वारकां पुरीम् ॥ १५३ ॥ नयनं द्रौपदेयानां धृष्टद्युम्नेन चैव ह । प्रवेशः पाण्डवेयानां रम्ये द्वैतवने ततः ॥ १५४ ॥ इसी पर्वमें महर्षि व्यासने सौभवधकी कथा कही है। श्रीकृष्ण सुभद्राको पुत्रसहित द्वारकामें ले गये। धृष्टद्युम्न द्रौपदीके पुत्रोंको अपने साथ लिवा ले गये। तदनन्तर पाण्डवोंने परम रमणीय द्वैतवनमें प्रवेश किया ॥ १५३-१५४ ॥ धर्मराजस्य चात्रैव संवादः कृष्णया सह । संवादश्च तथा राज्ञा भीमस्यापि प्रकीर्तितः ॥ १५५ ॥ इसी पर्वमें युधिष्ठिर एवं द्रौपदीका संवाद तथा युधिष्ठिर और भीमसेनके संवादका भलीभाँति वर्णन किया गया है ॥ १५५ ॥ समीपं पाण्डुपुत्राणां व्यासस्यागमनं तथा । प्रतिस्मृत्याथ विद्याया दानं राज्ञो महर्षिणा ॥ १५६ ॥ महर्षि व्यास पाण्डवोंके पास आये और उन्होंने राजा युधिष्ठिरको प्रतिस्मृति नामक मन्त्रविद्याका उपदेश दिया ॥ १५६ ॥ गमनं काम्यके चापि व्यासे प्रतिगते ततः । अस्त्रहेतोर्विवासश्च पार्थस्यामिततेजसः ॥ १५७ ॥ व्यासजीके चले जानेपर पाण्डवोंने काम्यकवनकी यात्रा की। इसके बाद अमिततेजस्वी अर्जुन अस्त्र प्राप्त करनेके लिये अपने भाइयोंसे अलग चले गये ॥ १५७ ॥ महादेवेन युद्धं च किरातवपुषा सह । दर्शनं लोकपालाना मस्त्रप्राप्तिस्तथैव च ॥ १५८ ॥ वहीं किरातवेशधारी महादेवजीके साथ अर्जुनका युद्ध हुआ, लोकपालोंके दर्शन हुए और अस्त्रकी प्राप्ति हुई ॥ १५८ ॥ महेन्द्रलोकगमनमस्त्रार्थे च किरीटिनः । यत्र चिन्ता समुत्पन्ना धृतराष्ट्रस्य भूयसी ॥ १५९ ॥ इसके बाद अर्जुन अस्त्रके लिये इन्द्रलोकमें गये यह सुनकर धृतराष्ट्रको बड़ी चिन्ता हुई ॥ १५९ ॥
दर्शनं बृहदश्वस्य महर्षेर्भावितात्मनः । युधिष्ठिरस्य चार्तस्य व्यसनं परिदेवनम् ॥ १६० ॥
इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरको शुद्धहृदय महर्षि बृहदश्वका दर्शन हुआ। युधिष्ठिरने आर्त होकर उन्हें अपनी दुःखगाथा सुनायी और विलाप किया ॥ १६० ॥
नलोपाख्यानमत्रैव धर्मिष्ठं करुणोदयम् । दमयन्त्याः स्थितैर्यत्र नलस्य चरितं तथा ॥ १६१ ॥
इसी प्रसंगमें नलोपाख्यान आता है, जिसमें धर्मनिष्ठाका अनुपम आदर्श है और जिसे पढ़-सुनकर हृदयमें करुणाकी धारा बहने लगती है। दमयन्तीका दृढ़ धैर्य और नलका चरित्र यहीं पढ़नेको मिलते हैं ॥ १६१ ॥
तथाक्षहृदयप्राप्तिस्तस्मादेव महर्षितः । लोमशस्यागमस्तत्र स्वर्गात् पाण्डुसुतान् प्रति ॥ १६२ ॥ वनवासगतानां च पाण्डवानां महात्मनाम् । स्वर्गे वृत्तिराख्याता लोमशेनार्जुनस्य वै ॥ १६३ ॥
उन्हीं महर्षिसे पाण्डवोंको अक्षहृदय (जूएके रहस्य)-की प्राप्ति हुई। यहीं स्वर्गसे महर्षि लोमश पाण्डवोंके पास पधारे। लोमशने ही वनवासी महात्मा पाण्डवोंको यह बात बतलायी कि अर्जुन स्वर्गमें किस प्रकार अस्त्र-विद्या सीख रहे हैं ॥ १६२-१६३ ॥
संदेशादर्जुनस्यात्र तीर्थाभिगमनक्रिया । तीर्थानां च फलप्राप्तिः पुण्यत्वं चापि कीर्तितम् ॥ १६४ ॥
इसी पर्वमें अर्जुनका संदेश पाकर पाण्डवोंने तीर्थयात्रा की। उन्हें तीर्थयात्राका फल प्राप्त हुआ और कौन तीर्थ कितने पुण्यप्रद होते हैं—इस बातका वर्णन हुआ है ॥ १६४ ॥
पुलस्त्यतीर्थयात्रा च नारदेन महर्षिणा । तीर्थयात्रा च तत्रैव पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १६५ ॥ कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् । तथा यज्ञविभूतिश्च गयस्यात्र प्रकीर्तिता ॥ १६६ ॥
इसके बाद महर्षि नारदने पुलस्त्यतीर्थकी यात्रा करनेकी प्रेरणा दी और महात्मा पाण्डवोंने वहाँकी यात्रा की। यहीं इन्द्रके द्वारा कर्णको कुण्डलोंसे वंचित करनेका तथा राजा गयके यज्ञवैभवका वर्णन किया गया है ॥ १६५-१६६ ॥
आगस्त्यमपि चाख्यानं यत्र वातापिभक्षणम् । लोपामुद्राभिगमनमपत्यार्थमृषेस्तथा ॥ १६७ ॥
इसके बाद अगस्त्य-चरित्र है, जिसमें उनके वातापिभक्षण तथा संतानके लिये लोपामुद्राके साथ समागमका वर्णन है ॥ १६७ ॥
ऋष्यशृङ्गस्य चरितं कौमारब्रह्मचारिणः । जामदग्न्यस्य रामस्य चरितं भूरितेजसः ॥ १६८ ॥
इसके पश्चात् कौमार ब्रह्मचारी ऋष्यशृंगका चरित्र है। फिर परम तेजस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामका चरित्र है ।। १६८ ।।
कार्तवीर्यवधो यत्र हैहयानां च वर्ण्यते ।
प्रभासतीर्थे पाण्डूनां वृष्णिभिश्च समागमः ।। १६९ ।।
इसी चरित्रमें कार्तवीर्य अर्जुन तथा हैहयवंशी राजाओंके वधका वर्णन किया गया है। प्रभासतीर्थमें पाण्डवों एवं यादवोंके मिलनेकी कथा भी इसीमें है ।। १६९ ।।
सीकन्यमपि चाख्यानं च्यवनो यत्र भार्गवः ।
शर्यांतियज्ञे नासत्यौ कृतवान् सोमपीतिनौ ।। १७० ।।
इसके बाद सुकन्याका उपाख्यान है। इसीमें यह कथा है कि भृगुनन्दन च्यवनने शर्यातिके यज्ञमें अश्विनीकुमारोंको सोमपानका अधिकारी बना दिया ।। १७० ।।
ताभ्यां च यत्र स मुनिर्यौवनं प्रतिपादितः ।
मान्धातुश्चाप्युपाख्यानं राज्ञोऽत्रैव प्रकीर्तितम् ।। १७१ ।।
उन्हीं दोनोंने च्यवन मुनिको बूढ़ेसे जवान बना दिया। राजा मान्धाताकी कथा भी इसी पर्वमें कही गयी है ।। १७१ ।।
जन्तूपाख्यानमत्रैव यत्र पुत्रेण सोमकः ।
पुत्रार्थमयजद् राजा लेभे पुत्रशतं च सः ।। १७२ ।।
यहीं जन्तूपाख्यान है। इसमें राजा सोमकने बहुत-से पुत्र प्राप्त करनेके लिये एक पुत्रसे यजन किया और उसके फलस्वरूप सौ पुत्र प्राप्त किये ।। १७२ ।।
ततः श्येनकपोतीयमुपाख्यानमनुत्तमम् ।
इन्द्राग्नी यत्र धर्मस्य जिज्ञासार्थं शिबिं नृपम् ।। १७३ ।।
इसके बाद श्येन (बाज) और कपोत (कबूतर)-का सर्वोत्तम उपाख्यान है। इसमें इन्द्र और अग्नि राजा शिबिके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये आये हैं ।। १७३ ।।
अष्टावक्रीयमत्रैव विवादो यत्र बन्दिना ।
अष्टावक्रस्य विप्रर्षेर्जनकस्याध्वरेऽभवत् ।। १७४ ।।
नैयायिकानां मुख्येन वरुणस्यात्मजेन च ।
पराजितो यत्र बन्दी विवादेन महात्मना ।। १७५ ।।
विजित्य सागरं प्राप्तं पितरं लब्धवानृषिः ।
यवक्रीतस्य चाख्यानं रैभ्यस्य च महात्मनः ।
गन्धमादनयात्रा च वासो नारायणाश्रमे ।। १७६ ।।
इसी पर्वमें अष्टावक्रका चरित्र भी है। जिसमें बन्दीके साथ जनकके यज्ञमें ब्रह्मर्षि अष्टावक्रके शास्त्रार्थका वर्णन है। वह बन्दी वरुणका पुत्र था और नैयायिकोंमें प्रधान था। उसे महात्मा अष्टावक्रने वाद-विवादमें पराजित कर दिया। महर्षि अष्टावक्रने बन्दीको हराकर समुद्रमें डाले हुए अपने पिताको प्राप्त कर लिया। इसके बाद यवक्रीत और महात्मा
रैभ्यका उपाख्यान है। तदनन्तर पाण्डवोंकी गन्धमादनयात्रा और नारायणाश्रममें निवासका वर्णन है ॥ १७४—१७६ ॥
नियुक्तो भीमसेनश्च द्रौपद्या गन्धमादने ।
व्रजन् पथि महाबाहुर्दृष्टवान् पवनात्मजम् ॥ १७७ ॥
कदलीखण्डमध्यस्थं हनूमन्तं महाबलम् ।
यत्र सौगन्धिकार्थेऽसौ नलिनीं तामधर्षयत् ॥ १७८ ॥
द्रौपदीने सौगन्धिक कमल लानेके लिये भीमसेनको गन्धमादन पर्वतपर भेजा। यात्रा करते समय महाबाहु भीमसेनने मार्गमें कदलीवनमें महाबली पवननन्दन श्रीहनुमान्जीका दर्शन किया। यहीं सौगन्धिक कमलके लिये भीमसेनने सरोवरमें घुसकर उसे मथ डाला ॥ १७७-१७८ ॥
यत्रास्य युद्धमभवत् सुमहद् राक्षसैः सह ।
यक्षैश्चैव महावीर्यैर्मणिमत्प्रमुखैस्तथा ॥ १७९ ॥
वहीं भीमसेनका राक्षसों एवं महाशक्तिशाली मणिमान् आदि यक्षोंके साथ घमासान युद्ध हुआ ॥ १७९ ॥
जटासुरस्य च वधो राक्षसस्य वृकोदरात् ।
वृषपर्वणश्च राजर्षेस्ततोऽभिगमनं स्मृतम् ॥ १८० ॥
आर्ष्टिषेणाश्रमे चैषां गमनं वास एव च ।
प्रोत्साहनं च पाञ्चाल्या भीमस्यात्र महात्मनः ॥ १८१ ॥
कैलासारोहणं प्रोक्तं यत्र यक्षैर्बलोत्कटैः ।
युद्धमासीन्महाघोरं मणिमत्प्रमुखैः सह ॥ १८२ ॥
तत्पश्चात् भीमसेनके द्वारा जटासुर राक्षसका वध हुआ। फिर पाण्डव क्रमशः राजर्षि वृषपर्वा और आर्ष्टिषेणके आश्रमपर गये और वहीं रहने लगे। यहीं द्रौपदी महात्मा भीमसेनको प्रोत्साहित करती रही। भीमसेन कैलासपर्वतपर चढ़ गये। यहीं अपनी शक्तिके नशेमें चूर मणिमान् आदि यक्षोंके साथ उनका अत्यन्त घोर युद्ध हुआ ॥ १८०-१८२ ॥
समागमश्च पाण्डूनां यत्र वैश्रवणेन च ।
समागमश्चार्जुनस्य तत्रैव भ्रातृभिः सह ॥ १८३ ॥
यहीं पाण्डवोंका कुबेरके साथ समागम हुआ। इसी स्थानपर अर्जुन आकर अपने भाइयोंसे मिले ॥ १८३ ॥
अवाप्य दिव्यान्यस्त्राणि गुर्वर्थं सव्यसाचिना ।
निवातकवचैर्युद्धं हिरण्यपुरवासिभिः ॥ १८४ ॥
इधर सव्यसाची अर्जुनने अपने बड़े भाईके लिये दिव्य अस्त्र प्राप्त कर लिये और हिरण्यपुरवासी निवातकवच दानवोंके साथ उनका घोर युद्ध हुआ ॥ १८४ ॥
निवातकवचैर्घोरैर्दानवैः सुरशत्रुभिः ।
पौलोमैः कालकेयैश्च यत्र युद्धं किरीटिनः ॥ १८५ ॥ वधश्चैषां समाख्यातों राज्ञस्तेनैव धीमता । अस्त्रसंदर्शनारम्भो धर्मराजस्य संनिधौ ॥ १८६ ॥ वहाँ देवताओंके शत्रु भयंकर दानव निवातकवच, पौलोम और कालकेयोंके साथ अर्जुनने जैसा युद्ध किया और जिस प्रकार उन सबका वध हुआ था, वह सब बुद्धिमान् अर्जुनने स्वयं राजा युधिष्ठिरको सुनाया। इसके बाद अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपने अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करना चाहा ॥ १८४-१८६ ॥ पार्थस्य प्रतिषेधश्च नारदेन सुरर्षिणा । अवरोहणं पुनश्चैव पाण्डूनां गन्धमादनात् ॥ १८७ ॥ इसी समय देवर्षि नारदने आकर अर्जुनको अस्त्र-प्रदर्शनसे रोक दिया। अब पाण्डव गन्धमादन पर्वतसे नीचे उतरने लगे ॥ १८७ ॥ भीमस्य ग्रहणं चात्र पर्वताभोगवर्ष्मणा । भुजगेन्द्रेण बलिना तस्मिन् सुगहने वने ॥ १८८ ॥ फिर एक बीहड़ वनमें पर्वतके समान विशाल शरीरधारी बलवान् अजगरने भीमसेनको पकड़ लिया ॥ १८८ ॥ अमोक्षयद् यत्र चैनं प्रश्नानुक्त्वा युधिष्ठिरः । काम्यकागमनं चैव पुनस्तेषां महात्मनाम् ॥ १८९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने अजगर-वेशधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देकर भीमसेनको छुड़ा लिया। इसके बाद महानुभाव पाण्डव पुनः काम्यकवनमें आये ॥ १८९ ॥ तत्रस्थांश्च पुनर्द्रष्टुं पाण्डवान् पुरुषर्षभान् । वासुदेवस्यागमनमत्रैव परिकीर्तितम् ॥ १९० ॥ जब नरपुंगव पाण्डव काम्यकवनमें निवास करने लगे, तब उनसे मिलनेके लिये वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण उनके पास आये—यह कथा इसी प्रसंगमें कही गयी है ॥ १९० ॥ मार्कण्डेयसमास्यायामुपाख्यानानि सर्वशः । पृथौर्वैन्यस्य यत्रोक्तमाख्यानं परमर्षिणा ॥ १९१ ॥ पाण्डवोंका महामुनि मार्कण्डेयके साथ समागम हुआ। वहाँ महर्षिने बहुत-से उपाख्यान सुनाये। उनमें वेनपुत्र पृथुका भी उपाख्यान है ॥ १९१ ॥ संवादश्च सरस्वत्यास्तार्क्ष्यर्षेः सुमहात्मनः । मत्स्योपाख्यानमत्रैव प्रोच्यते तदनन्तरम् ॥ १९२ ॥ इसी प्रसंगमें प्रसिद्ध महात्मा महर्षि तार्क्ष्य और सरस्वतीका संवाद है। तदनन्तर मत्स्योपाख्यान भी कहा गया है ॥ १९२ ॥ मार्कण्डेयसमास्या च पुराणं परिकीर्त्यते । ऐन्द्रद्युम्नमुपाख्यानं धौन्धुमारं तथैव च ॥ १९३ ॥
इसी मार्कण्डेय-समागममें पुराणोंकी अनेक कथाएँ, राजा इन्द्रद्युम्नका उपाख्यान तथा धुन्धुमारकी कथा भी है ।। १९३ ।। पतिव्रतायाश्चाख्यानं तथैवाङ्गिरसं स्मृतम् । द्रौपद्याः कीर्तितश्चात्र संवादः सत्यभामया ।। १९४ ।। पतिव्रताका और आंगिरसका उपाख्यान भी इसी प्रसंगमें है। द्रौपदीका सत्यभामाके साथ संवाद भी इसीमें है ।। १९४ ।। पुनर्द्वैतवनं चैव पाण्डवाः समुपागताः । घोषयात्रा च गन्धर्वैर्यत्र बद्धः सुयोधनः ।। १९५ ।। तदनन्तर धर्मात्मा पाण्डव पुनः द्वैतवनमें आये। कौरवोंने घोषयात्रा की और गन्धर्वोंने दुर्योधनको बन्दी बना लिया ।। १९५ ।। ह्रियमाणस्तु मन्दात्मा मोक्षितोऽसौ किरीटिना । धर्मराजस्य चात्रैव मृगस्वप्ननिदर्शनम् ।। १९६ ।।
वे मन्दमति दुर्योधनको कैद करके लिये जा रहे थे कि अर्जुनने युद्ध करके उसे छुड़ा लिया। इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरको स्वप्नमें हरिणके दर्शन हुए ॥ १९६ ॥ काम्यके काननश्रेष्ठे पुनर्गमनमुच्यते । व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमत्रैव बहुविस्तरम् ॥ १९७ ॥ इसके पश्चात् पाण्डवगण काम्यक नामक श्रेष्ठ वनमें फिरसे गये। इसी प्रसंगमें अत्यन्त विस्तारके साथ व्रीहिद्रौणिक उपाख्यान भी कहा गया है ॥ १९७ ॥ दुर्वाससोऽप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । जयद्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात् ॥ १९८ ॥ इसीमें दुर्वासाजीका उपाख्यान और जयद्रथके द्वारा आश्रमसे द्रौपदीके हरणकी कथा भी कही गयी है ॥ १९८ ॥ यत्रैनमन्वयाद् भीमो वायुवेगसमो जवे । चक्रे चैनं पञ्चशिखं यत्र भीमो महाबलः ॥ १९९ ॥ उस समय महाबली भयंकर भीमसेनने वायुवेगसे दौड़कर उसका पीछा किया था तथा जयद्रथके सिरके सारे बाल मूँड़कर उसमें पाँच चोटियाँ रख दी थीं ॥ १९९ ॥ रामायणमुपाख्यानमत्रैव बहुविस्तरम् । यत्र रामेण विक्रम्य निहतो रावणो युधि ॥ २०० ॥ वनपर्वमें बड़े ही विस्तारके साथ रामायणका उपाख्यान है, जिसमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने युद्धभूमिमें अपने पराक्रमसे रावणका वध किया है ॥ २०० ॥ सावित्र्याश्चाप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् ॥ २०१ ॥ इसके बाद ही सावित्रीका उपाख्यान और इन्द्रके द्वारा कर्णको कुण्डलोंसे वंचित कर देनेकी कथा है ॥ २०१ ॥ यत्रास्य शक्तिं तुष्टोऽसावदादेकवधाय च । आरणेयमुपाख्यानं यत्र धर्मोऽन्वशात् सुतम् ॥ २०२ ॥ इसी प्रसंगमें इन्द्रने प्रसन्न होकर कर्णको एक शक्ति दी थी, जिससे कोई भी एक वीर मारा जा सकता था। इसके बाद है आरणेय उपाख्यान, जिसमें धर्मराजने अपने पुत्र युधिष्ठिरको शिक्षा दी है ॥ २०२ ॥ जग्मुर्लब्धवरा यत्र पाण्डवाः पश्चिमां दिशम् । एतदारण्यकं पर्व तृतीयं परिकीर्तितम् ॥ २०३ ॥ अत्राध्यायशते द्वे तु संख्यया परिकीर्तिते । एकोनसप्ततिश्चैव तथाध्यायाः प्रकीर्तिताः ॥ २०४ ॥ और उनसे वरदान प्राप्तकर पाण्डवोंने पश्चिम दिशाकी यात्रा की। यह तीसरे वनपर्वकी सूची कही गयी। इस पर्वमें गिनकर दो सौ उनहत्तर (२६९) अध्याय कहे गये
हैं ।। २०३-२०४ ।। एकादशसहस्राणि श्लोकानां षट् शतानि च । चतुःषष्टिस्तथाश्लोकाः पर्वण्यस्मिन् प्रकीर्तिताः ।। २०५ ।। ग्यारह हजार छह सौ चौंसठ (११,६६४) श्लोक इस पर्वमें हैं ।। २०५ ।। अतः परं निबोधेदं वैराटं पर्व विस्तरम् । विराटनगरे गत्वा श्मशाने विपुलां शमीम् ।। २०६ ।। दृष्ट्वा संनिदधुस्तत्र पाण्डवा ह्यायुधान्युत । यत्र प्रविश्य नगरं छद्मना न्यवसंस्तु ते ।। २०७ ।। इसके बाद विराटपर्वकी विस्तृत सूची सुनो। पाण्डवोंने विराटनगरमें जाकर श्मशानके पास एक विशाल शमीका वृक्ष देखा। उसीपर उन्होंने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र रख दिये। तदनन्तर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया और छद्मवेशमें वहाँ निवास करने लगे ।। २०६-२०७ ।। पाञ्चालीं प्रार्थयानस्य कामोपहतचेतसः । दुष्टात्मनो वधो यत्र कीचकस्य वृकोदरात् ।। २०८ ।। कीचक स्वभावसे ही दुष्ट था। द्रौपदीको देखते ही उसका मन कामबाणसे घायल हो गया। वह द्रौपदीके पीछे पड़ गया। इसी अपराधसे भीमसेनने उसे मार डाला। यह कथा इसी पर्वमें है ।। २०८ ।। पाण्डवान्वेषणार्थं च राज्ञो दुर्योधनस्य च । चाराः प्रस्थापिताश्चात्र निपुणाः सर्वतोदिशम् ।। २०९ ।। राजा दुर्योधनने पाण्डवोंका पता चलानेके लिये बहुत-से निपुण गुप्तचर सब ओर भेजे ।। २०९ ।। न च प्रवृत्तिस्तैर्लब्धा पाण्डवानां महात्मनाम् । गोग्रहश्च विराटस्य त्रिगर्तैः प्रथमं कृतः ।। २१० ।। परंतु उन्हें महात्मा पाण्डवोंकी गतिविधिका कोई हालचाल न मिला। इन्हीं दिनों त्रिगर्तोंने राजा विराटकी गौओंका प्रथम बार अपहरण कर लिया ।। २१० ।। यत्रास्य युद्धं सुमहत् तैरासील्लोमहर्षणम् । ह्रियमाणश्च यत्रासौ भीमसेनेन मोक्षितः ।। २११ ।। राजा विराटने त्रिगर्तोंके साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाला घमासान युद्ध किया। त्रिगर्त विराटको पकड़कर लिये जा रहे थे; किंतु भीमसेनने उन्हें छुड़ा लिया ।। २११ ।। गोधनं च विराटस्य मोक्षितं यत्र पाण्डवैः । अनन्तरं च कुरुभिस्तस्य गोग्रहणं कृतम् ।। २१२ ।। साथ ही पाण्डवोंने उनके गोधनको भी त्रिगर्तोंसे छुड़ा लिया। इसके बाद ही कौरवोंने विराटनगरपर चढ़ाई करके उनकी (उत्तर दिशाकी) गायोंको लूटना प्रारम्भ कर
दिया ।। २१२ ।। समस्ता यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि । प्रत्याहृतं गोधनं च विक्रमेण किरीटिना ।। २१३ ।। इसी अवसरपर किरीटधारी अर्जुनने अपना पराक्रम प्रकट करके संग्रामभूमिमें सम्पूर्ण कौरवोंको पराजित कर दिया और विराटके गोधनको लौटा लिया ।। २१३ ।। विराटेनोत्तरा दत्ता स्नुषा यत्र किरीटिनः । अभिमन्युं समुद्दिश्य सौभद्रमरिघातिनम् ।। २१४ ।। (पाण्डवोंके पहचाने जानेपर) राजा विराटने अपनी पुत्री उत्तरा शत्रुघाती सुभद्रानन्दन अभिमन्युसे विवाह करनेके लिये पुत्रवधूके रूपमें अर्जुनको दे दी ।। २१४ ।। चतुर्थमेतद् विपुलं वैराटं पर्व वर्णितम् । अत्रापि परिसंख्याता अध्यायाः परमर्षिणा ।। २१५ ।। सप्तषष्टिरथो पूर्णा श्लोकानामपि मे शृणु । श्लोकानां द्वे सहस्रे तु श्लोकाः पञ्चाशदेव तु ।। २१६ ।। उक्तानि वेदविदुषा पर्वण्यस्मिन् महर्षिणा । उद्योगपर्व विज्ञेयं पञ्चमं शृण्वतः परम् ।। २१७ ।। इस प्रकार इस चौथे विराटपर्वकी सूचीका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया। परमर्षि व्यासजी महाराजने इस पर्वमें गिनकर सड़सठ (६७) अध्याय रखे हैं। अब तुम मुझसे श्लोकोंकी संख्या सुनो। इस पर्वमें दो हजार पचास (२,०५०) श्लोक वेदवेत्ता महर्षि वेदव्यासने कहे हैं। इसके बाद पाँचवाँ उद्योगपर्व समझना चाहिये। अब तुम उसकी विषय-सूची सुनो ।। २१५—२१७ ।। उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु जिगीषया । दुर्योधनोऽर्जुनश्चैव वासुदेवमुपस्थितौ ।। २१८ ।। जब पाण्डव उपप्लव्यनगरमें रहने लगे, तब दुर्योधन और अर्जुन विजयकी आकांक्षासे भगवान् श्रीकृष्णके पास उपस्थित हुए ।। २१८ ।। साहाय्यमस्मिन् समरे भवान् नौ कर्तुमर्हति । इत्युक्ते वचने कृष्णो यत्रोवाच महामतिः ।। २१९ ।। दोनोंने ही भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना की कि 'आप इस युद्धमें हमारी सहायता कीजिये।' इसपर महामना श्रीकृष्णने कहा— ।। २१९ ।। अयुध्यमानमात्मानं मन्त्रिणं पुरुषर्षभौ । अक्षौहिणीं वा सैन्यस्य कस्य किं वा ददाम्यहम् ।। २२० ।। 'दुर्योधन और अर्जुन! तुम दोनों ही श्रेष्ठ पुरुष हो। मैं स्वयं युद्ध न करके एकका मन्त्री बन जाऊँगा और दूसरेको एक अक्षौहिणी सेना दे दूँगा। अब तुम्हीं दोनों निश्चय करो कि किसे क्या दूँ?' ।। २२० ।।
वव्रे दुर्योधनः सैन्यं मन्दात्मा यत्र दुर्मतिः ।
अयुध्यमानं सचिवं वव्रे कृष्णं धनञ्जयः ॥ २२१ ॥
अपने स्वार्थके सम्बन्धमें अनजान एवं खोटी बुद्धिवाले दुर्योधनने एक अक्षौहिणी सेना माँग ली और अर्जुनने यह माँग की कि ‘श्रीकृष्ण युद्ध भले ही न करें, परंतु मेरे मन्त्री बन जायँ’ ॥ २२१ ॥
मद्रराजं च राजानमायान्तं पाण्डवान् प्रति ।
उपहारैर्वञ्चयित्वा वर्त्मन्येव सुयोधनः ॥ २२२ ॥
वरदं तं वरं वव्रे साहाय्यं क्रियतां मम ।
शल्यस्तस्मै प्रतिश्रुत्य जगामोद्दिश्य पाण्डवान् ॥ २२३ ॥
शान्तिपूर्वं चाकथयद् यत्रेन्द्रविजयं नृपः ।
पुरोहितप्रेषणं च पाण्डवैः कौरवान् प्रति ॥ २२४ ॥
मद्रदेशके अधिपति राजा शल्य पाण्डवोंकी ओरसे युद्ध करने आ रहे थे, परंतु दुर्योधनने मार्गमें ही उपहारोंसे धोखेमें डालकर उन्हें प्रसन्न कर लिया और उन वरदायक नरेशसे यह वर माँगा कि ‘मेरी सहायता कीजिये।’ शल्यने दुर्योधनसे सहायताकी प्रतिज्ञा कर ली। इसके बाद वे पाण्डवोंके पास गये और बड़ी शान्तिके साथ सब कुछ समझा-बुझाकर सब बात कह दी। राजाने इसी प्रसंगमें इन्द्रकी विजयकी कथा भी सुनायी। पाण्डवोंने अपने पुरोहितको कौरवोंके पास भेजा ॥ २२२—२२४ ॥
वैचित्रवीर्यस्य वचः समादाय पुरोधसः ।
तथेन्द्रविजयं चापि यानं चैव पुरोधसः ॥ २२५ ॥
संजयं प्रेषयामास शमार्थी पाण्डवान् प्रति ।
यत्र दूतं महाराजो धृतराष्ट्रः प्रतापवान् ॥ २२६ ॥
धृतराष्ट्रने पाण्डवोंके पुरोहितके इन्द्रविजयविषयक वचनको सादर श्रवण करते हुए उनके आगमनके औचित्यको स्वीकार किया। तत्पश्चात् परम प्रतापी महाराज धृतराष्ट्रने भी शान्तिकी इच्छासे दूतके रूपमें संजयको पाण्डवोंके पास भेजा ॥ २२५-२२६ ॥
श्रुत्वा च पाण्डवान् यत्र वासुदेवपुरोगमान् ।
प्रजागरः सम्प्रजज्ञे धृतराष्ट्रस्य चिन्तया ॥ २२७ ॥
विदुरो यत्र वाक्यानि विचित्राणि हितानि च ।
श्रावयामास राजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ॥ २२८ ॥
जब धृतराष्ट्रने सुना कि पाण्डवोंने श्रीकृष्णको अपना नेता चुन लिया है और वे उन्हें आगे करके युद्धके लिये प्रस्थान कर रहे हैं, तब चिन्ताके कारण उनकी नींद भाग गयी—वे रातभर जागते रह गये। उस समय महात्मा विदुरने मनीषी राजा धृतराष्ट्रको विविध प्रकारसे अत्यन्त आश्चर्यजनक नीतिका उपदेश किया है (वही विदुरनीतिके नामसे प्रसिद्ध है) ॥ २२७-२२८ ॥
तथा सनत्सुजातेन यत्राध्यात्ममनुत्तमम् । मनस्तापान्वितो राजा श्रावितः शोकलालसः ॥ २२९ ॥ उसी समय महर्षि सनत्सुजातने खिन्नचित्त एवं शोकविह्वल राजा धृतराष्ट्रको सर्वोत्तम अध्यात्मशास्त्रका श्रवण कराया ॥ २२९ ॥
प्रभाते राजसमितौ संजयो यत्र वा विभोः । ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ॥ २३० ॥ प्रातःकाल राजसभामें संजयने राजा धृतराष्ट्रसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके ऐकात्म्य अथवा मित्रताका भलीभाँति वर्णन किया ॥ २३० ॥
यत्र कृष्णो दयापन्नः संधिमिच्छन् महामतिः । स्वयमागाच्छमं कर्तुं नगरं नागसाह्वयम् ॥ २३१ ॥ इसी प्रसंगमें यह कथा भी है कि परम दयालु सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण दया-भावसे युक्त हो शान्ति-स्थापनके लिये सन्धि करानेके उद्देश्यसे स्वयं हस्तिनापुर नामक नगरमें पधारे ॥ २३१ ॥
प्रत्याख्यानं च कृष्णस्य राज्ञा दुर्योधनेन वै । शमार्थे याचमानस्य पक्षयोरुभयोर्हितम् ॥ २३२ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण दोनों ही पक्षोंका हित चाहते थे और शान्तिके लिये प्रार्थना कर रहे थे, परंतु राजा दुर्योधनने उनका विरोध कर दिया ॥ २३२ ॥
दम्भोद्भवस्य चाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । वरान्वेषणमत्रैव मातलेश्च महात्मनः ॥ २३३ ॥ इसी पर्वमें दम्भोद्भवकी कथा कही गयी है और साथ ही महात्मा मातलिकी अपनी कन्याके लिये वर ढूँढ़नेका प्रसंग भी है ॥ २३३ ॥
महर्षेश्चापि चरितं कथितं गालवस्य वै । विदुलायाश्च पुत्रस्य प्रोक्तं चाप्यनुशासनम् ॥ २३४ ॥ इसके बाद महर्षि गालवके चरित्रका वर्णन है। साथ ही विदुलाने अपने पुत्रको जो शिक्षा दी है, वह भी कही गयी है ॥ २३४ ॥
कर्णदुर्योधनादीनां दुष्टं विज्ञाय मन्त्रितम् । योगेश्वरत्वं कृष्णेन यत्र राज्ञां प्रदर्शितम् ॥ २३५ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कर्ण और दुर्योधन आदिकी दूषित मन्त्रणाको जानकर राजाओंकी भरी सभामें अपने योगैश्वर्यका प्रदर्शन किया ॥ २३५ ॥
रथमारोप्य कृष्णेन यत्र कर्णोऽनुमन्त्रितः । उपायपूर्वं शौटीर्यात् प्रत्याख्यातश्च तेन सः ॥ २३६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कर्णको अपने रथपर बैठाकर उसे (पाण्डवोंके पक्षमें आनेके लिये) अनेक युक्तियोंसे बहुत समझाया-बुझाया, परंतु कर्णने अहंकारवश उनकी बात अस्वीकार
कर दी ॥ २३६ ॥ आगम्य ह्वास्तिनपुरादुपप्लव्यमरिन्दमः । पाण्डवानां यथावृत्तं सर्वमाख्यातवान् हरिः ॥ २३७ ॥ शत्रुसूदन श्रीकृष्णने हस्तिनापुरसे उपप्लव्यनगर आकर जैसा कुछ वहाँ हुआ था, सब पाण्डवोंको कह सुनाया ॥ २३७ ॥ ते तस्य वचनं श्रुत्वा मन्त्रयित्वा च यद्धितम् । सांग्रामिकं ततः सर्वं सज्जं चक्रुः परंतपाः ॥ २३८ ॥ शत्रुघाती पाण्डव उनके वचन सुनकर और क्या करनेमें हमारा हित है—यह परामर्श करके युद्ध-सम्बन्धी सब सामग्री जुटानेमें लग गये ॥ २३८ ॥ ततो युद्धाय निर्याता नराश्वरथदन्तिनः । नगराद्धास्तिनपुराद् बलसंख्यानमेव च ॥ २३९ ॥ इसके पश्चात् हस्तिनापुर नामक नगरसे युद्धके लिये मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंकी चतुरंगिणी सेनाने कूच किया। इसी प्रसंगमें सेनाकी गिनती की गयी है ॥ २३९ ॥ यत्र राज्ञा ह्युलूकस्य प्रेषणं पाण्डवान् प्रति । श्वोभाविनि महायुद्धे दौत्येन कृतवान् प्रभुः ॥ २४० ॥ फिर यह कहा गया है कि शक्तिशाली राजा दुर्योधनने दूसरे दिन प्रातःकालसे होनेवाले महायुद्धके सम्बन्धमें उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजा ॥ २४० ॥ रथातिरथसंख्यानमम्बोपाख्यानमेव च । एतत् सुबहुवृत्तान्तं पञ्चमं पर्व भारते ॥ २४१ ॥ इसके अनन्तर इस पर्वमें रथी, अतिरथी आदिके स्वरूपका वर्णन तथा अम्बाका उपाख्यान आता है। इस प्रकार महाभारतमें उद्योगपर्व पाँचवाँ पर्व है और इसमें बहुत-से सुन्दर-सुन्दर वृत्तान्त हैं ॥ २४१ ॥ उद्योगपर्व निर्दिष्टं संधिविग्रहमिश्रितम् । अध्यायानां शतं प्रोक्तं षडशीतिर्महर्षिणा ॥ २४२ ॥ श्लोकानां षट्सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । श्लोकाश्च नवतिः प्रोक्तास्तथैवाष्टौ महात्मना ॥ २४३ ॥ व्यासेनोदारमतिना पर्वण्यस्मिंस्तपोधनाः । इस उद्योगपर्वमें श्रीकृष्णके द्वारा सन्धि-संदेश और उलूकके विग्रह-संदेशका महत्त्वपूर्ण वर्णन हुआ है। तपोधन महर्षियो! विशालबुद्धि महर्षि व्यासने इस पर्वमें एक सौ छियासी (१८६) अध्याय रखे हैं और श्लोकोंकी संख्या छः हजार छः सौ अट्ठानबे (६,६९८) बतायी है ॥ २४२-२४३ १/२ ॥ अतः परं विचित्रार्थं भीष्मपर्व प्रचक्षते ॥ २४४ ॥ जम्बूखण्डविनिर्माणं यत्रोक्तं संजयेन ह ।
यत्र यौधिष्ठिरं सैन्यं विषादमगमत् परम् ॥ २४५ ॥ यत्र युद्धमभूद् घोरं दशाहानि सुदारुणम् । कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः ॥ २४६ ॥ मोहजं नाशयामास हेतुभिर्मोक्षदर्शिभिः । समीक्ष्याधोक्षजः क्षिप्रं युधिष्ठिरहिते रतः ॥ २४७ ॥ रथादाप्लुत्य वेगेन स्वयं कृष्ण उदारधीः । प्रतोदपाणिराधावद् भीष्मं हन्तु व्यपेतभीः ॥ २४८ ॥ इसके बाद विचित्र अर्थोंसे भरे भीष्मपर्वकी विषय-सूची कही जाती है, जिसमें संजयने जम्बूद्वीपकी रचनासम्बन्धी कथा कही है। इस पर्वमें दस दिनोंतक अत्यन्त भयंकर घोर युद्ध होनेका वर्णन आता है, जिसमें धर्मराज युधिष्ठिरकी सेनाके अत्यन्त दुःखी होनेकी कथा है। इसी युद्धके प्रारम्भमें महातेजस्वी भगवान् वासुदेवने मोक्षतत्त्वका ज्ञान करानेवाली युक्तियोंद्वारा अर्जुनके मोहजनित शोक-संतापका नाश किया था (जो कि भगवद्गीताके नामसे प्रसिद्ध है)। इसी पर्वमें यह कथा भी है कि युधिष्ठिरके हितमें संलग्न रहनेवाले निर्भय, उदारबुद्धि, अधोक्षज, भक्तवत्सल भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनकी शिथिलता देख शीघ्र ही हाथमें चाबुक लेकर भीष्मको मारनेके लिये स्वयं रथसे कूद पड़े और बड़े वेगसे दौड़े ॥ २४४—२४८ ॥
वाक्यप्रतोदाभिहतो यत्र कृष्णेन पाण्डवः । गाण्डीवधन्वा समरे सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ २४९ ॥ साथ ही सब शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ गाण्डीवधन्वा अर्जुनको युद्धभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णने व्यंग्य-वाक्यके चाबुकसे मार्मिक चोट पहुँचायी ॥ २४९ ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य यत्र पार्थो महाधनुः । विनिघ्नन् निशितैर्बाणै रथाद् भीष्ममपातयत् ॥ २५० ॥ तब महाधनुर्धर अर्जुनने शिखण्डीको सामने करके तीखे बाणोंसे घायल करते हुए भीष्मपितामहको रथसे गिरा दिया ॥ २५० ॥
शरतल्पगतश्चैव भीष्मो यत्र बभूव ह । षष्ठमेतत् समाख्यातं भारते पर्व विस्तृतम् ॥ २५१ ॥ जबकि भीष्मपितामह शरशय्यापर शयन करने लगे। महाभारतमें यह छठा पर्व विस्तारपूर्वक कहा गया है ॥ २५१ ॥
अध्यायानां शतं प्रोक्तं तथा सप्तदशापरे । पञ्च श्लोकसहस्राणि संख्ययाष्टौ शतानि च ॥ २५२ ॥ श्लोकाश्च चतुराशीतिरस्मिन् पर्वणि कीर्तिताः । व्यासेन वेदविदुषा संख्याता भीष्मपर्वणि ॥ २५३ ॥
वेदके मर्मज्ञ विद्वान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने इस भीष्मपर्वमें एक सौ सत्रह (११७) अध्याय रखे हैं। श्लोकोंकी संख्या पाँच हजार आठ सौ चौरासी (५,८८४) कही गयी है ।। २५२-२५३ ।।
द्रोणपर्व ततश्चित्रं बहुवृत्तान्तमुच्यते ।
सैनापत्येऽभिषिक्तोऽथ यत्राचार्यः प्रतापवान् ।। २५४ ।।
तदनन्तर अनेक वृत्तान्तोंसे पूर्ण अद्भुत द्रोणपर्वकी कथा आरम्भ होती है, जिसमें परम प्रतापी आचार्य द्रोणके सेनापतिपदपर अभिषिक्त होनेका वर्णन है ।। २५४ ।।
दुर्योधनस्य प्रीत्यर्थं प्रतिजज्ञे महास्त्रवित् ।
ग्रहणं धर्मराजस्य पाण्डुपुत्रस्य धीमतः ।। २५५ ।।
वहीं यह भी कहा गया है कि अस्त्रविद्याके परमाचार्य द्रोणने दुर्योधनको प्रसन्न करनेके लिये बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरको पकड़नेकी प्रतिज्ञा कर ली ।। २५५ ।।
यत्र संशप्तकाः पार्थमपनिन्यू रणाजिरात् ।
भगदत्तो महाराजो यत्र शक्रसमो युधि ।। २५६ ।।
सुप्रतीकेन नागेन स हि शान्तः किरीटिना ।
इसी पर्वमें यह बताया गया है कि संशप्तक योद्धा अर्जुनको रणांगणसे दूर हटा ले गये। वहीं यह कथा भी आयी है कि ऐरावतवंशीय सुप्रतीक नामक हाथीके साथ महाराज भगदत्त भी, जो युद्धमें इन्द्रके समान थे, किरीटधारी अर्जुनके द्वारा मौतके घाट उतार दिये गये ।। २५६ १/२ ।।
यत्राभिमन्युं बहवो जघ्नुरेकं महारथाः ।। २५७ ।।
जयद्रथमुखा बालं शूरमप्राप्तयौवनम् ।
इसी पर्वमें यह भी कहा गया है कि शूरवीर बालक अभिमन्युको, जो अभी जवान भी नहीं हुआ था और अकेला था, जयद्रथ आदि बहुत-से विश्वविख्यात महारथियोंने मार डाला ।। २५७ १/२ ।।
हतेऽभिमन्यौ क्रुद्धेन यत्र पार्थेन संयुगे ।। २५८ ।।
अक्षौहिणीः सप्त हत्वा हतो राजा जयद्रथः ।
अभिमन्युके वधसे कुपित होकर अर्जुनने रणभूमिमें सात अक्षौहिणी सेनाओंका संहार करके राजा जयद्रथको भी मार डाला ।। २५८ १/२ ।।
यत्र भीमो महाबाहुः सात्यकिश्च महारथः ।। २५९ ।।
अन्वेषणार्थं पार्थस्य युधिष्ठिरनृपाज्ञया ।
प्रविष्टौ भारतीं सेनामप्रधृष्यां सुरैरपि ।। २६० ।।
उसी अवसरपर महाबाहु भीमसेन और महारथी सात्यकि धर्मराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे अर्जुनको ढूँढ़नेके लिये कौरवोंकी उस सेनामें घुस गये, जिसकी मोर्चेबन्दी बड़े-बड़े देवता भी नहीं तोड़ सकते थे ।। २५९-२६० ।।
संशप्तकावशेषं च कृतं निःशेषमाहवे । संशप्तकानां वीराणां कोट्यो नव महात्मनाम् ॥ २६१ ॥ किरीटिनाभिनिष्क्रम्य प्रापिता यमसादनम् । धृतराष्ट्रस्य पुत्राश्च तथा पाषाणयोधिनः ॥ २६२ ॥ नारायणाश्च गोपालाः समरे चित्रयोधिनः । अलम्बुषः श्रुतायुश्च जलसन्धश्च वीर्यवान् ॥ २६३ ॥ सौमदत्तिर्विराटश्च द्रुपदश्च महारथः । घटोत्कचादयश्चान्ये निहता द्रोणपर्वणि ॥ २६४ ॥ अर्जुनने संशप्तकोंमेंसे जो बच रहे थे, उन्हें भी युद्धभूमिमें निःशेष कर दिया। महामना संशप्तक वीरोंकी संख्या नौ करोड़ थी; परंतु किरीटधारी अर्जुनने आक्रमण करके अकेले ही उन सबको यमलोक भेज दिया। धृतराष्ट्रपुत्र, बड़े-बड़े पाषाणखण्ड लेकर युद्ध करनेवाले म्लेच्छ-सैनिक, समरांगणमें युद्धके विचित्र कला-कौशलका परिचय देनेवाले नारायण नामक गोप, अलम्बुष, श्रुतायु, पराक्रमी जलसन्ध, भूरिश्रवा, विराट, महारथी द्रुपद तथा घटोत्कच आदि जो बड़े-बड़े वीर मारे गये हैं, वह प्रसंग भी इसी पर्वमें है ।। २६१—२६४ ।।
अश्वत्थामापि चात्रैव द्रोणे युधि निपातिते । अस्त्रं प्रादुश्चकारोग्रं नारायणममर्षितः ॥ २६५ ॥ इसी पर्वमें यह बात भी आयी है कि युद्धमें जब पिता द्रोणाचार्य मार गिराये गये, तब अश्वत्थामाने भी शत्रुओंके प्रति अमर्षमें भरकर 'नारायण' नामक भयानक अस्त्रको प्रकट किया था ।। २६५ ।।
आग्नेयं कीर्त्यते यत्र रुद्रमाहात्म्यमुत्तमम् । व्यासस्य चाप्यागमनं माहात्म्यं कृष्णपार्थयोः ॥ २६६ ॥ इसीमें आग्नेयास्त्र तथा भगवान् रुद्रके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया गया है। व्यासजीके आगमन तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनके माहात्म्यकी कथा भी इसीमें है ।। २६६ ।।
सप्तमं भारते पर्व महदेतदुदाहृतम् । यत्र ते पृथिवीपालाः प्रायशो निधनं गताः ॥ २६७ ॥ द्रोणपर्वणि ये शूरा निर्दिष्टाः पुरुषर्षभाः । अत्राध्यायशतं प्रोक्तं तथाध्यायाश्च सप्ततिः ॥ २६८ ॥ अष्टौ श्लोकसहस्राणि तथा नव शतानि च । श्लोका नव तथैवात्र संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ॥ २६९ ॥ पाराशर्येण मुनिना संचिन्त्य द्रोणपर्वणि ।
महाभारतमें यह सातवाँ महान् पर्व बताया गया है। कौरव-पाण्डवयुद्धमें जो नरश्रेष्ठ नरेश शूरवीर बताये गये हैं, उनमेंसे अधिकांशके मारे जानेका प्रसंग इस द्रोणपर्वमें ही आया है। तत्त्वदर्शी पराशरनन्दन मुनिवर व्यासने भलीभाँति सोच-विचारकर द्रोणपर्वमें एक सौ सत्तर (१७०) अध्यायों और आठ हजार नौ सौ नौ (८,९०९) श्लोकोंकी रचना एवं गणना की है ।। २६७—२६९ १/२ ।।
अतः परं कर्णपर्व प्रोच्यते परमाद्भुतम् ।। २७० ।।
सारथ्ये विनियोगश्च मद्रराजस्य धीमतः ।
आख्यातं यत्र पौराणं त्रिपुरस्य निपातनम् ।। २७१ ।।
इसके बाद अत्यन्त अद्भुत कर्णपर्वका परिचय दिया गया है। इसीमें परम बुद्धिमान् मद्रराज शल्यको कर्णके सारथि बनानेका प्रसंग है, फिर त्रिपुरके संहारकी पुराणप्रसिद्ध कथा आयी है ।। २७०-२७१ ।।
प्रयागे परुषश्चात्र संवादः कर्णशल्ययोः ।
हंसकाकीयमाख्यानं तत्रैवाक्षेपसंहितम् ।। २७२ ।।
युद्धके लिये जाते समय कर्ण और शल्यमें जो कठोर संवाद हुआ है, उसका वर्णन भी इसी पर्वमें है। तदनन्तर हंस और कौएका आक्षेपपूर्ण उपाख्यान है ।। २७२ ।।
वधः पाण्ड्यस्य च तथा अश्वत्थाम्ना महात्मना ।
दण्डसेनस्य च ततो दण्डस्य च वधस्तथा ।। २७३ ।।
उसके बाद महात्मा अश्वत्थामाके द्वारा राजा पाण्ड्यके वधकी कथा है। फिर दण्डसेन और दण्डके वधका प्रसंग है ।। २७३ ।।
द्वैरथे यत्र कर्णेन धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
संशयं गमितो युद्धे मिषतां सर्वधन्विनाम् ।। २७४ ।।
इसी पर्वमें कर्णके साथ युधिष्ठिरके द्वैरथ (द्वन्द्व) युद्धका वर्णन है, जिसमें कर्णने सब धनुर्धर वीरोंके देखते-देखते धर्मराज युधिष्ठिरके प्राणोंको संकटमें डाल दिया था ।। २७४ ।।
अन्योन्यं प्रति च क्रोधो युधिष्ठिरकिरीटिनोः ।
यत्रैवानुनयः प्रोक्तो माधवेनार्जुनस्य हि ।। २७५ ।।
तत्पश्चात् युधिष्ठिर और अर्जुनके एक-दूसरेके प्रति क्रोधयुक्त उद्गार हैं, जहाँ भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको समझा-बुझाकर शान्त किया है ।। २७५ ।।
प्रतिज्ञापूर्वकं चापि वक्षो दुःशासनस्य च ।
भित्त्वा वृकोदरो रक्तं पीतवान् यत्र संयुगे ।। २७६ ।।
इसी पर्वमें यह बात भी आयी है कि भीमसेनने पहलेकी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार दुःशासनका वक्षःस्थल विदीर्ण करके रक्त पीया था ।। २७६ ।।
द्वैरथे यत्र पार्थेन हतः कर्णो महारथः ।
अष्टमं पर्व निर्दिष्टमेतद् भारतचिन्तकैः ।। २७७ ।।
तदनन्तर द्वन्द्वयुद्धमें अर्जुनने महारथी कर्णको जो मार गिराया, वह प्रसंग भी कर्णपर्वमें ही है। महाभारतका विचार करनेवाले विद्वानोंने इस कर्णपर्वको आठवाँ पर्व कहा है ॥ २७७ ॥
एकोनसप्ततिः प्रोक्ता अध्यायाः कर्णपर्वणि ।
चत्वार्यैव सहस्राणि नव श्लोकशतानि च ॥ २७८ ॥
चतुःषष्टिस्तथा श्लोकाः पर्वण्यस्मिन् प्रकीर्तिताः ।
कर्णपर्वमें उनहत्तर (६९) अध्याय कहे गये हैं और चार हजार नौ सौ चौंसठ (४,९६४) श्लोकोंका पाठ इस पर्वमें किया गया है ॥ २७८ ½ ॥
अतः परं विचित्रार्थं शल्यपर्व प्रकीर्तितम् ॥ २७९ ॥
तत्पश्चात् विचित्र अर्थयुक्त विषयोंसे भरा हुआ शल्यपर्व कहा गया है ॥ २७९ ॥
हतप्रवीरे सैन्ये तु नेता मद्रेश्वरोऽभवत् ।
यत्र कौमारमाख्यानमभिषेकस्य कर्म च ॥ २८० ॥
इसीमें यह कथा आयी है कि जब कौरवसेनाके सभी प्रमुख वीर मार दिये गये, तब मद्रराज शल्य सेनापति हुए। वहीं कुमार कार्तिकेयका उपाख्यान और अभिषेककर्म कहा गया है ॥ २८० ॥
वृत्तानि रथयुद्धानि कीर्त्यन्ते यत्र भागशः ।
विनाशः कुरुमुख्यानां शल्यपर्वणि कीर्त्यते ॥ २८१ ॥
शल्यस्य निधनं चात्र धर्मराजान्महात्मनः ।
शकुनेश्च वधोऽत्रैव सहदेवेन संयुगे ॥ २८२ ॥
साथ ही वहाँ रथियोंके युद्धका भी विभागपूर्वक वर्णन किया गया है। शल्यपर्वमें ही कुरुकुलके प्रमुख वीरोंके विनाशका तथा महात्मा धर्मराजद्वारा शल्यके वधका वर्णन किया गया है। इसीमें सहदेवके द्वारा युद्धमें शकुनिके मारे जानेका प्रसंग है ॥ २८१-२८२ ॥
सैन्ये च हतभूयिष्ठे किंचिच्छिष्टे सुयोधनः ।
ह्रदं प्रविश्य यत्रासौ संस्तभ्यापो व्यवस्थितः ॥ २८३ ॥
जब अधिक-से-अधिक कौरवसेना नष्ट हो गयी और थोड़ी-सी बच रही, तब दुर्योधन सरोवरमें प्रवेश करके पानीको स्तम्भित कर वहीं विश्रामके लिये बैठ गया ॥ २८३ ॥
प्रवृत्तिस्तत्र चाख्याता यत्र भीमस्य लुब्धकैः ।
क्षेपयुक्तैर्वचोभिश्च धर्मराजस्य धीमतः ॥ २८४ ॥
ह्रदात् समुत्थितो यत्र धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ।
भीमेन गदया युद्धं यत्रासी कृतवान् सह ॥ २८५ ॥
किंतु व्याधोंने भीमसेनसे दुर्योधनकी यह चेष्टा बतला दी। तब बुद्धिमान् धर्मराजके आक्षेपयुक्त वचनोंसे अत्यन्त अमर्षमें भरकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन सरोवरसे बाहर निकला और उसने भीमसेनके साथ गदायुद्ध किया। ये सब प्रसंग शल्यपर्वमें ही हैं ॥ २८४-२८५ ॥
समवाये च युद्धस्य रामस्यागमनं स्मृतम् ।
सरस्वत्याश्च तीर्थानां पुण्यता परिकीर्तिता ॥ २८६ ॥
गदायुद्धं च तुमुलमात्रैव परिकीर्तितम् ।
उसीमें युद्धके समय बलरामजीके आगमनकी बात कही गयी है। इसी प्रसंगमें सरस्वतीतटवर्ती तीर्थोंके पावन माहात्म्यका परिचय दिया गया है। शल्यपर्वमें ही भयंकर गदायुद्धका वर्णन किया गया है ॥ २८६ ½ ॥
दुर्योधनस्य राज्ञोऽथ यत्र भीमेन संयुगे ॥ २८७ ॥
ऊरू भग्नी प्रसह्याजौ गदया भीमवेगया ।
नवमं पर्व निर्दिष्टमेतदद्भुतार्थवत् ॥ २८८ ॥
जिसमें युद्ध करते समय भीमसेनने हठपूर्वक (युद्धके नियमको भंग करके) अपनी भयानक वेग-शालिनी गदासे राजा दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालीं, यह अद्भुत अर्थसे युक्त नवाँ पर्व बताया गया है ॥ २८७-२८८ ॥
एकोनषष्टिरध्यायाः पर्वण्यत्र प्रकीर्तिताः ।
संख्याता बहुवृत्तान्ताः श्लोकसंख्यात्र कथ्यते ॥ २८९ ॥
इस पर्वमें उनसठ (५९) अध्याय कहे गये हैं, जिसमें बहुत-से वृत्तान्तोंका वर्णन आया है। अब इसकी श्लोक-संख्या कही जाती है ॥ २८९ ॥
त्रीणि श्लोकसहस्त्राणि द्वे शते विंशतिस्तथा ।
मुनिना सम्प्रणीतानि कौरवाणां यशोभृता ॥ २९० ॥
कौरव-पाण्डवोंके यशका पोषण करनेवाले मुनिवर व्यासने इस पर्वमें तीन हजार दो सौ बीस (३,२२०) श्लोकोंकी रचना की है ॥ २९० ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि सौप्तिकं पर्व दारुणम् ।
भग्नोरुं यत्र राजानं दुर्योधनममर्षणम् ॥ २९१ ॥
अपयातेषु पार्थेषु त्रयस्तेऽभ्याययू रथाः ।
कृतवर्मा कृपो द्रौणिः सायाह्ने रुधिरोक्षितम् ॥ २९२ ॥
इसके पश्चात् मैं अत्यन्त दारुण सौप्तिकपर्वकी सूची बता रहा हूँ, जिसमें पाण्डवोंके चले जानेपर अत्यन्त अमर्षमें भरे हुए टूटी जाँघवाले राजा दुर्योधनके पास, जो खूनसे लथपथ हुआ पड़ा था, सायंकालके समय कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्वत्थामा—ये तीन महारथी आये ॥ २९१-२९२ ॥
समेत्य ददृशुर्भूमौ पतितं रणमूर्धनि ।
प्रतिजज्ञे दृढक्रोधो द्रौणिर्यत्र महारथः ॥ २९३ ॥
अहत्वा सर्वपञ्चालान् धृष्टद्युम्नपुरोगमान् ।
पाण्डवांश्च सहामात्यान् न विमोक्ष्यामि दंशनम् ॥ २९४ ॥
निकट आकर उन्होंने देखा, राजा दुर्योधन युद्धके मुहानेपर इस दुर्दशामें पड़ा था। यह देखकर महारथी अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं धृष्टद्युम्न आदि सम्पूर्ण पांचालों और मन्त्रियोंसहित समस्त पाण्डवोंका वध किये बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा’ ॥ २९३-२९४ ॥
यत्रैवमुक्त्वा राजानमपक्रम्य त्रयो रथाः । सूर्यास्तमनवेलायामासेदुस्ते महद् वनम् ॥ २९५ ॥ सौप्तिकपर्वमें राजा दुर्योधनसे ऐसी बात कहकर वे तीनों महारथी वहाँसे चले गये और सूर्यास्त होते-होते एक बहुत बड़े वनमें जा पहुँचे ॥ २९५ ॥
न्यग्रोधस्याथ महतो यत्राधस्ताद् व्यवस्थिताः । ततः काकान् बहून् रात्रौ दृष्ट्वोलूकेन हिंसितान् ॥ २९६ ॥ द्रौणिः क्रोधसमाविष्टः पितुर्वधमनुस्मरन् । पञ्चालानां प्रसुप्तानां वधं प्रति मनो दधे ॥ २९७ ॥ वहाँ तीनों एक बहुत बड़े बरगदके नीचे विश्रामके लिये बैठे। तदनन्तर वहाँ एक उल्लूने आकर रातमें बहुत-से कौओंको मार डाला। यह देखकर क्रोधमें भरे अश्वत्थामाने अपने पिताके अन्यायपूर्वक मारे जानेकी घटनाको स्मरण करके सोते समय ही पांचालोंके वधका निश्चय कर लिया ॥ २९६-२९७ ॥
गत्वा च शिबिरद्वारि दुर्दर्शं तत्र राक्षसम् । घोररूपमपश्यत् स दिवमावृत्य धिष्ठितम् ॥ २९८ ॥ तत्पश्चात् पाण्डवोंके शिविरके द्वारपर पहुँचकर उसने देखा, एक बड़ा भयंकर राक्षस, जिसकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वहाँ खड़ा है। उसने पृथ्वीसे लेकर आकाशतकके प्रदेशको घेर रखा था ॥ २९८ ॥
तेन व्याघातमस्त्राणां क्रियमाणमवेक्ष्य च । द्रौणिर्यत्र विरूपाक्षं रुद्रमाराध्य सत्वरः ॥ २९९ ॥ अश्वत्थामा जितने भी अस्त्र चलाता, उन सबको वह राक्षस नष्ट कर देता था। यह देखकर द्रोणकुमारने तुरंत ही भयंकर नेत्रोंवाले भगवान् रुद्रकी आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया ॥ २९९ ॥
प्रसुप्तान् निशि विश्वस्तान् धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । पञ्चालान् सपरीवारान् द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥ ३०० ॥ कृतवर्मणा च सहितः कृपेण च निजघ्निवान् । यत्रामुच्यन्त ते पार्थाः पञ्च कृष्णबलाश्रयात् ॥ ३०१ ॥ सात्यकिश्च महेष्वासः शेषाश्च निधनं गताः । पञ्चालानां प्रसुप्तानां यत्र द्रोणसुताद् वधः ॥ ३०२ ॥ धृष्टद्युम्नस्य सूतेन पाण्डवेषु निवेदितः ।