भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 111

दिया ।। २१२ ।। समस्ता यत्र पार्थेन निर्जिताः कुरवो युधि । प्रत्याहृतं गोधनं च विक्रमेण किरीटिना ।। २१३ ।। इसी अवसरपर किरीटधारी अर्जुनने अपना पराक्रम प्रकट करके संग्रामभूमिमें सम्पूर्ण कौरवोंको पराजित कर दिया और विराटके गोधनको लौटा लिया ।। २१३ ।। विराटेनोत्तरा दत्ता स्नुषा यत्र किरीटिनः । अभिमन्युं समुद्दिश्य सौभद्रमरिघातिनम् ।। २१४ ।। (पाण्डवोंके पहचाने जानेपर) राजा विराटने अपनी पुत्री उत्तरा शत्रुघाती सुभद्रानन्दन अभिमन्युसे विवाह करनेके लिये पुत्रवधूके रूपमें अर्जुनको दे दी ।। २१४ ।। चतुर्थमेतद् विपुलं वैराटं पर्व वर्णितम् । अत्रापि परिसंख्याता अध्यायाः परमर्षिणा ।। २१५ ।। सप्तषष्टिरथो पूर्णा श्लोकानामपि मे शृणु । श्लोकानां द्वे सहस्रे तु श्लोकाः पञ्चाशदेव तु ।। २१६ ।। उक्तानि वेदविदुषा पर्वण्यस्मिन् महर्षिणा । उद्योगपर्व विज्ञेयं पञ्चमं शृण्वतः परम् ।। २१७ ।। इस प्रकार इस चौथे विराटपर्वकी सूचीका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया। परमर्षि व्यासजी महाराजने इस पर्वमें गिनकर सड़सठ (६७) अध्याय रखे हैं। अब तुम मुझसे श्लोकोंकी संख्या सुनो। इस पर्वमें दो हजार पचास (२,०५०) श्लोक वेदवेत्ता महर्षि वेदव्यासने कहे हैं। इसके बाद पाँचवाँ उद्योगपर्व समझना चाहिये। अब तुम उसकी विषय-सूची सुनो ।। २१५—२१७ ।। उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु जिगीषया । दुर्योधनोऽर्जुनश्चैव वासुदेवमुपस्थितौ ।। २१८ ।। जब पाण्डव उपप्लव्यनगरमें रहने लगे, तब दुर्योधन और अर्जुन विजयकी आकांक्षासे भगवान् श्रीकृष्णके पास उपस्थित हुए ।। २१८ ।। साहाय्यमस्मिन् समरे भवान् नौ कर्तुमर्हति । इत्युक्ते वचने कृष्णो यत्रोवाच महामतिः ।। २१९ ।। दोनोंने ही भगवान् श्रीकृष्णसे प्रार्थना की कि 'आप इस युद्धमें हमारी सहायता कीजिये।' इसपर महामना श्रीकृष्णने कहा— ।। २१९ ।। अयुध्यमानमात्मानं मन्त्रिणं पुरुषर्षभौ । अक्षौहिणीं वा सैन्यस्य कस्य किं वा ददाम्यहम् ।। २२० ।। 'दुर्योधन और अर्जुन! तुम दोनों ही श्रेष्ठ पुरुष हो। मैं स्वयं युद्ध न करके एकका मन्त्री बन जाऊँगा और दूसरेको एक अक्षौहिणी सेना दे दूँगा। अब तुम्हीं दोनों निश्चय करो कि किसे क्या दूँ?' ।। २२० ।।