महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 110, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंहैं ।। २०३-२०४ ।। एकादशसहस्राणि श्लोकानां षट् शतानि च । चतुःषष्टिस्तथाश्लोकाः पर्वण्यस्मिन् प्रकीर्तिताः ।। २०५ ।। ग्यारह हजार छह सौ चौंसठ (११,६६४) श्लोक इस पर्वमें हैं ।। २०५ ।। अतः परं निबोधेदं वैराटं पर्व विस्तरम् । विराटनगरे गत्वा श्मशाने विपुलां शमीम् ।। २०६ ।। दृष्ट्वा संनिदधुस्तत्र पाण्डवा ह्यायुधान्युत । यत्र प्रविश्य नगरं छद्मना न्यवसंस्तु ते ।। २०७ ।। इसके बाद विराटपर्वकी विस्तृत सूची सुनो। पाण्डवोंने विराटनगरमें जाकर श्मशानके पास एक विशाल शमीका वृक्ष देखा। उसीपर उन्होंने अपने सारे अस्त्र-शस्त्र रख दिये। तदनन्तर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया और छद्मवेशमें वहाँ निवास करने लगे ।। २०६-२०७ ।। पाञ्चालीं प्रार्थयानस्य कामोपहतचेतसः । दुष्टात्मनो वधो यत्र कीचकस्य वृकोदरात् ।। २०८ ।। कीचक स्वभावसे ही दुष्ट था। द्रौपदीको देखते ही उसका मन कामबाणसे घायल हो गया। वह द्रौपदीके पीछे पड़ गया। इसी अपराधसे भीमसेनने उसे मार डाला। यह कथा इसी पर्वमें है ।। २०८ ।। पाण्डवान्वेषणार्थं च राज्ञो दुर्योधनस्य च । चाराः प्रस्थापिताश्चात्र निपुणाः सर्वतोदिशम् ।। २०९ ।। राजा दुर्योधनने पाण्डवोंका पता चलानेके लिये बहुत-से निपुण गुप्तचर सब ओर भेजे ।। २०९ ।। न च प्रवृत्तिस्तैर्लब्धा पाण्डवानां महात्मनाम् । गोग्रहश्च विराटस्य त्रिगर्तैः प्रथमं कृतः ।। २१० ।। परंतु उन्हें महात्मा पाण्डवोंकी गतिविधिका कोई हालचाल न मिला। इन्हीं दिनों त्रिगर्तोंने राजा विराटकी गौओंका प्रथम बार अपहरण कर लिया ।। २१० ।। यत्रास्य युद्धं सुमहत् तैरासील्लोमहर्षणम् । ह्रियमाणश्च यत्रासौ भीमसेनेन मोक्षितः ।। २११ ।। राजा विराटने त्रिगर्तोंके साथ रोंगटे खड़े कर देनेवाला घमासान युद्ध किया। त्रिगर्त विराटको पकड़कर लिये जा रहे थे; किंतु भीमसेनने उन्हें छुड़ा लिया ।। २११ ।। गोधनं च विराटस्य मोक्षितं यत्र पाण्डवैः । अनन्तरं च कुरुभिस्तस्य गोग्रहणं कृतम् ।। २१२ ।। साथ ही पाण्डवोंने उनके गोधनको भी त्रिगर्तोंसे छुड़ा लिया। इसके बाद ही कौरवोंने विराटनगरपर चढ़ाई करके उनकी (उत्तर दिशाकी) गायोंको लूटना प्रारम्भ कर