भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

वे मन्दमति दुर्योधनको कैद करके लिये जा रहे थे कि अर्जुनने युद्ध करके उसे छुड़ा लिया। इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिरको स्वप्नमें हरिणके दर्शन हुए ॥ १९६ ॥ काम्यके काननश्रेष्ठे पुनर्गमनमुच्यते । व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमत्रैव बहुविस्तरम् ॥ १९७ ॥ इसके पश्चात् पाण्डवगण काम्यक नामक श्रेष्ठ वनमें फिरसे गये। इसी प्रसंगमें अत्यन्त विस्तारके साथ व्रीहिद्रौणिक उपाख्यान भी कहा गया है ॥ १९७ ॥ दुर्वाससोऽप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । जयद्रथेनापहारो द्रौपद्याश्चाश्रमान्तरात् ॥ १९८ ॥ इसीमें दुर्वासाजीका उपाख्यान और जयद्रथके द्वारा आश्रमसे द्रौपदीके हरणकी कथा भी कही गयी है ॥ १९८ ॥ यत्रैनमन्वयाद् भीमो वायुवेगसमो जवे । चक्रे चैनं पञ्चशिखं यत्र भीमो महाबलः ॥ १९९ ॥ उस समय महाबली भयंकर भीमसेनने वायुवेगसे दौड़कर उसका पीछा किया था तथा जयद्रथके सिरके सारे बाल मूँड़कर उसमें पाँच चोटियाँ रख दी थीं ॥ १९९ ॥ रामायणमुपाख्यानमत्रैव बहुविस्तरम् । यत्र रामेण विक्रम्य निहतो रावणो युधि ॥ २०० ॥ वनपर्वमें बड़े ही विस्तारके साथ रामायणका उपाख्यान है, जिसमें भगवान् श्रीरामचन्द्रजीने युद्धभूमिमें अपने पराक्रमसे रावणका वध किया है ॥ २०० ॥ सावित्र्याश्चाप्युपाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । कर्णस्य परिमोक्षोऽत्र कुण्डलाभ्यां पुरन्दरात् ॥ २०१ ॥ इसके बाद ही सावित्रीका उपाख्यान और इन्द्रके द्वारा कर्णको कुण्डलोंसे वंचित कर देनेकी कथा है ॥ २०१ ॥ यत्रास्य शक्तिं तुष्टोऽसावदादेकवधाय च । आरणेयमुपाख्यानं यत्र धर्मोऽन्वशात् सुतम् ॥ २०२ ॥ इसी प्रसंगमें इन्द्रने प्रसन्न होकर कर्णको एक शक्ति दी थी, जिससे कोई भी एक वीर मारा जा सकता था। इसके बाद है आरणेय उपाख्यान, जिसमें धर्मराजने अपने पुत्र युधिष्ठिरको शिक्षा दी है ॥ २०२ ॥ जग्मुर्लब्धवरा यत्र पाण्डवाः पश्चिमां दिशम् । एतदारण्यकं पर्व तृतीयं परिकीर्तितम् ॥ २०३ ॥ अत्राध्यायशते द्वे तु संख्यया परिकीर्तिते । एकोनसप्ततिश्चैव तथाध्यायाः प्रकीर्तिताः ॥ २०४ ॥ और उनसे वरदान प्राप्तकर पाण्डवोंने पश्चिम दिशाकी यात्रा की। यह तीसरे वनपर्वकी सूची कही गयी। इस पर्वमें गिनकर दो सौ उनहत्तर (२६९) अध्याय कहे गये