महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकर दी ॥ २३६ ॥ आगम्य ह्वास्तिनपुरादुपप्लव्यमरिन्दमः । पाण्डवानां यथावृत्तं सर्वमाख्यातवान् हरिः ॥ २३७ ॥ शत्रुसूदन श्रीकृष्णने हस्तिनापुरसे उपप्लव्यनगर आकर जैसा कुछ वहाँ हुआ था, सब पाण्डवोंको कह सुनाया ॥ २३७ ॥ ते तस्य वचनं श्रुत्वा मन्त्रयित्वा च यद्धितम् । सांग्रामिकं ततः सर्वं सज्जं चक्रुः परंतपाः ॥ २३८ ॥ शत्रुघाती पाण्डव उनके वचन सुनकर और क्या करनेमें हमारा हित है—यह परामर्श करके युद्ध-सम्बन्धी सब सामग्री जुटानेमें लग गये ॥ २३८ ॥ ततो युद्धाय निर्याता नराश्वरथदन्तिनः । नगराद्धास्तिनपुराद् बलसंख्यानमेव च ॥ २३९ ॥ इसके पश्चात् हस्तिनापुर नामक नगरसे युद्धके लिये मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंकी चतुरंगिणी सेनाने कूच किया। इसी प्रसंगमें सेनाकी गिनती की गयी है ॥ २३९ ॥ यत्र राज्ञा ह्युलूकस्य प्रेषणं पाण्डवान् प्रति । श्वोभाविनि महायुद्धे दौत्येन कृतवान् प्रभुः ॥ २४० ॥ फिर यह कहा गया है कि शक्तिशाली राजा दुर्योधनने दूसरे दिन प्रातःकालसे होनेवाले महायुद्धके सम्बन्धमें उलूकको दूत बनाकर पाण्डवोंके पास भेजा ॥ २४० ॥ रथातिरथसंख्यानमम्बोपाख्यानमेव च । एतत् सुबहुवृत्तान्तं पञ्चमं पर्व भारते ॥ २४१ ॥ इसके अनन्तर इस पर्वमें रथी, अतिरथी आदिके स्वरूपका वर्णन तथा अम्बाका उपाख्यान आता है। इस प्रकार महाभारतमें उद्योगपर्व पाँचवाँ पर्व है और इसमें बहुत-से सुन्दर-सुन्दर वृत्तान्त हैं ॥ २४१ ॥ उद्योगपर्व निर्दिष्टं संधिविग्रहमिश्रितम् । अध्यायानां शतं प्रोक्तं षडशीतिर्महर्षिणा ॥ २४२ ॥ श्लोकानां षट्सहस्राणि तावन्त्येव शतानि च । श्लोकाश्च नवतिः प्रोक्तास्तथैवाष्टौ महात्मना ॥ २४३ ॥ व्यासेनोदारमतिना पर्वण्यस्मिंस्तपोधनाः । इस उद्योगपर्वमें श्रीकृष्णके द्वारा सन्धि-संदेश और उलूकके विग्रह-संदेशका महत्त्वपूर्ण वर्णन हुआ है। तपोधन महर्षियो! विशालबुद्धि महर्षि व्यासने इस पर्वमें एक सौ छियासी (१८६) अध्याय रखे हैं और श्लोकोंकी संख्या छः हजार छः सौ अट्ठानबे (६,६९८) बतायी है ॥ २४२-२४३ १/२ ॥ अतः परं विचित्रार्थं भीष्मपर्व प्रचक्षते ॥ २४४ ॥ जम्बूखण्डविनिर्माणं यत्रोक्तं संजयेन ह ।