महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथा सनत्सुजातेन यत्राध्यात्ममनुत्तमम् । मनस्तापान्वितो राजा श्रावितः शोकलालसः ॥ २२९ ॥ उसी समय महर्षि सनत्सुजातने खिन्नचित्त एवं शोकविह्वल राजा धृतराष्ट्रको सर्वोत्तम अध्यात्मशास्त्रका श्रवण कराया ॥ २२९ ॥
प्रभाते राजसमितौ संजयो यत्र वा विभोः । ऐकात्म्यं वासुदेवस्य प्रोक्तवानर्जुनस्य च ॥ २३० ॥ प्रातःकाल राजसभामें संजयने राजा धृतराष्ट्रसे श्रीकृष्ण और अर्जुनके ऐकात्म्य अथवा मित्रताका भलीभाँति वर्णन किया ॥ २३० ॥
यत्र कृष्णो दयापन्नः संधिमिच्छन् महामतिः । स्वयमागाच्छमं कर्तुं नगरं नागसाह्वयम् ॥ २३१ ॥ इसी प्रसंगमें यह कथा भी है कि परम दयालु सर्वज्ञ भगवान् श्रीकृष्ण दया-भावसे युक्त हो शान्ति-स्थापनके लिये सन्धि करानेके उद्देश्यसे स्वयं हस्तिनापुर नामक नगरमें पधारे ॥ २३१ ॥
प्रत्याख्यानं च कृष्णस्य राज्ञा दुर्योधनेन वै । शमार्थे याचमानस्य पक्षयोरुभयोर्हितम् ॥ २३२ ॥ यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण दोनों ही पक्षोंका हित चाहते थे और शान्तिके लिये प्रार्थना कर रहे थे, परंतु राजा दुर्योधनने उनका विरोध कर दिया ॥ २३२ ॥
दम्भोद्भवस्य चाख्यानमत्रैव परिकीर्तितम् । वरान्वेषणमत्रैव मातलेश्च महात्मनः ॥ २३३ ॥ इसी पर्वमें दम्भोद्भवकी कथा कही गयी है और साथ ही महात्मा मातलिकी अपनी कन्याके लिये वर ढूँढ़नेका प्रसंग भी है ॥ २३३ ॥
महर्षेश्चापि चरितं कथितं गालवस्य वै । विदुलायाश्च पुत्रस्य प्रोक्तं चाप्यनुशासनम् ॥ २३४ ॥ इसके बाद महर्षि गालवके चरित्रका वर्णन है। साथ ही विदुलाने अपने पुत्रको जो शिक्षा दी है, वह भी कही गयी है ॥ २३४ ॥
कर्णदुर्योधनादीनां दुष्टं विज्ञाय मन्त्रितम् । योगेश्वरत्वं कृष्णेन यत्र राज्ञां प्रदर्शितम् ॥ २३५ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कर्ण और दुर्योधन आदिकी दूषित मन्त्रणाको जानकर राजाओंकी भरी सभामें अपने योगैश्वर्यका प्रदर्शन किया ॥ २३५ ॥
रथमारोप्य कृष्णेन यत्र कर्णोऽनुमन्त्रितः । उपायपूर्वं शौटीर्यात् प्रत्याख्यातश्च तेन सः ॥ २३६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णने कर्णको अपने रथपर बैठाकर उसे (पाण्डवोंके पक्षमें आनेके लिये) अनेक युक्तियोंसे बहुत समझाया-बुझाया, परंतु कर्णने अहंकारवश उनकी बात अस्वीकार