भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

पौलोमैः कालकेयैश्च यत्र युद्धं किरीटिनः ॥ १८५ ॥ वधश्चैषां समाख्यातों राज्ञस्तेनैव धीमता । अस्त्रसंदर्शनारम्भो धर्मराजस्य संनिधौ ॥ १८६ ॥ वहाँ देवताओंके शत्रु भयंकर दानव निवातकवच, पौलोम और कालकेयोंके साथ अर्जुनने जैसा युद्ध किया और जिस प्रकार उन सबका वध हुआ था, वह सब बुद्धिमान् अर्जुनने स्वयं राजा युधिष्ठिरको सुनाया। इसके बाद अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरके पास अपने अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करना चाहा ॥ १८४-१८६ ॥ पार्थस्य प्रतिषेधश्च नारदेन सुरर्षिणा । अवरोहणं पुनश्चैव पाण्डूनां गन्धमादनात् ॥ १८७ ॥ इसी समय देवर्षि नारदने आकर अर्जुनको अस्त्र-प्रदर्शनसे रोक दिया। अब पाण्डव गन्धमादन पर्वतसे नीचे उतरने लगे ॥ १८७ ॥ भीमस्य ग्रहणं चात्र पर्वताभोगवर्ष्मणा । भुजगेन्द्रेण बलिना तस्मिन् सुगहने वने ॥ १८८ ॥ फिर एक बीहड़ वनमें पर्वतके समान विशाल शरीरधारी बलवान् अजगरने भीमसेनको पकड़ लिया ॥ १८८ ॥ अमोक्षयद् यत्र चैनं प्रश्नानुक्त्वा युधिष्ठिरः । काम्यकागमनं चैव पुनस्तेषां महात्मनाम् ॥ १८९ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरने अजगर-वेशधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देकर भीमसेनको छुड़ा लिया। इसके बाद महानुभाव पाण्डव पुनः काम्यकवनमें आये ॥ १८९ ॥ तत्रस्थांश्च पुनर्द्रष्टुं पाण्डवान् पुरुषर्षभान् । वासुदेवस्यागमनमत्रैव परिकीर्तितम् ॥ १९० ॥ जब नरपुंगव पाण्डव काम्यकवनमें निवास करने लगे, तब उनसे मिलनेके लिये वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण उनके पास आये—यह कथा इसी प्रसंगमें कही गयी है ॥ १९० ॥ मार्कण्डेयसमास्यायामुपाख्यानानि सर्वशः । पृथौर्वैन्यस्य यत्रोक्तमाख्यानं परमर्षिणा ॥ १९१ ॥ पाण्डवोंका महामुनि मार्कण्डेयके साथ समागम हुआ। वहाँ महर्षिने बहुत-से उपाख्यान सुनाये। उनमें वेनपुत्र पृथुका भी उपाख्यान है ॥ १९१ ॥ संवादश्च सरस्वत्यास्तार्क्ष्यर्षेः सुमहात्मनः । मत्स्योपाख्यानमत्रैव प्रोच्यते तदनन्तरम् ॥ १९२ ॥ इसी प्रसंगमें प्रसिद्ध महात्मा महर्षि तार्क्ष्य और सरस्वतीका संवाद है। तदनन्तर मत्स्योपाख्यान भी कहा गया है ॥ १९२ ॥ मार्कण्डेयसमास्या च पुराणं परिकीर्त्यते । ऐन्द्रद्युम्नमुपाख्यानं धौन्धुमारं तथैव च ॥ १९३ ॥