महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिकट आकर उन्होंने देखा, राजा दुर्योधन युद्धके मुहानेपर इस दुर्दशामें पड़ा था। यह देखकर महारथी अश्वत्थामाको बड़ा क्रोध हुआ और उसने प्रतिज्ञा की कि ‘मैं धृष्टद्युम्न आदि सम्पूर्ण पांचालों और मन्त्रियोंसहित समस्त पाण्डवोंका वध किये बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा’ ॥ २९३-२९४ ॥
यत्रैवमुक्त्वा राजानमपक्रम्य त्रयो रथाः । सूर्यास्तमनवेलायामासेदुस्ते महद् वनम् ॥ २९५ ॥ सौप्तिकपर्वमें राजा दुर्योधनसे ऐसी बात कहकर वे तीनों महारथी वहाँसे चले गये और सूर्यास्त होते-होते एक बहुत बड़े वनमें जा पहुँचे ॥ २९५ ॥
न्यग्रोधस्याथ महतो यत्राधस्ताद् व्यवस्थिताः । ततः काकान् बहून् रात्रौ दृष्ट्वोलूकेन हिंसितान् ॥ २९६ ॥ द्रौणिः क्रोधसमाविष्टः पितुर्वधमनुस्मरन् । पञ्चालानां प्रसुप्तानां वधं प्रति मनो दधे ॥ २९७ ॥ वहाँ तीनों एक बहुत बड़े बरगदके नीचे विश्रामके लिये बैठे। तदनन्तर वहाँ एक उल्लूने आकर रातमें बहुत-से कौओंको मार डाला। यह देखकर क्रोधमें भरे अश्वत्थामाने अपने पिताके अन्यायपूर्वक मारे जानेकी घटनाको स्मरण करके सोते समय ही पांचालोंके वधका निश्चय कर लिया ॥ २९६-२९७ ॥
गत्वा च शिबिरद्वारि दुर्दर्शं तत्र राक्षसम् । घोररूपमपश्यत् स दिवमावृत्य धिष्ठितम् ॥ २९८ ॥ तत्पश्चात् पाण्डवोंके शिविरके द्वारपर पहुँचकर उसने देखा, एक बड़ा भयंकर राक्षस, जिसकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वहाँ खड़ा है। उसने पृथ्वीसे लेकर आकाशतकके प्रदेशको घेर रखा था ॥ २९८ ॥
तेन व्याघातमस्त्राणां क्रियमाणमवेक्ष्य च । द्रौणिर्यत्र विरूपाक्षं रुद्रमाराध्य सत्वरः ॥ २९९ ॥ अश्वत्थामा जितने भी अस्त्र चलाता, उन सबको वह राक्षस नष्ट कर देता था। यह देखकर द्रोणकुमारने तुरंत ही भयंकर नेत्रोंवाले भगवान् रुद्रकी आराधना करके उन्हें प्रसन्न किया ॥ २९९ ॥
प्रसुप्तान् निशि विश्वस्तान् धृष्टद्युम्नपुरोगमान् । पञ्चालान् सपरीवारान् द्रौपदेयांश्च सर्वशः ॥ ३०० ॥ कृतवर्मणा च सहितः कृपेण च निजघ्निवान् । यत्रामुच्यन्त ते पार्थाः पञ्च कृष्णबलाश्रयात् ॥ ३०१ ॥ सात्यकिश्च महेष्वासः शेषाश्च निधनं गताः । पञ्चालानां प्रसुप्तानां यत्र द्रोणसुताद् वधः ॥ ३०२ ॥ धृष्टद्युम्नस्य सूतेन पाण्डवेषु निवेदितः ।