महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रौपदी पुत्रशोकार्ता पितृभ्रातृवधार्दिता ॥ ३०३ ॥ तत्पश्चात् अश्वत्थामाने रातमें निःशंक सोये हुए धृष्टद्युम्न आदि पांचालों तथा द्रौपदीपुत्रोंको कृतवर्मा और कृपाचार्यकी सहायतासे परिजनोंसहित मार डाला। भगवान् श्रीकृष्णकी शक्तिका आश्रय लेनेसे केवल पाँच पाण्डव और महान् धनुर्धर सात्यकि बच गये, शेष सभी वीर मारे गये। यह सब प्रसंग सौप्तिकपर्वमें वर्णित है। वहीं यह भी कहा गया है कि धृष्टद्युम्नके सारथिने जब पाण्डवोंको यह सूचित किया कि द्रोणपुत्रने सोये हुए पांचालोंका वध कर डाला है, तब द्रौपदी पुत्रशोकसे पीड़ित तथा पिता और भाईकी हत्यासे व्यथित हो उठी ॥ ३००—३०३ ॥
कृतानशनसंकल्पा यत्र भर्तॄनुपाविशत् । द्रौपदीवचनाद् यत्र भीमो भीमपराक्रमः ॥ ३०४ ॥ प्रियं तस्याश्चिकीर्षन् वै गदामादाय वीर्यवान् । अन्वधावत् सुसंक्रुद्धो भारद्वाजं गुरोः सुतम् ॥ ३०५ ॥ वह पतियोंको अश्वत्थामासे इसका बदला लेनेके लिये उत्तेजित करती हुई आमरण अनशनका संकल्प ले अन्न-जल छोड़कर बैठ गयी। द्रौपदीके कहनेसे भयंकर पराक्रमी महाबली भीमसेन उसका प्रिय करनेकी इच्छासे हाथमें गदा ले अत्यन्त क्रोधमें भरकर गुरुपुत्र अश्वत्थामाके पीछे दौड़े ॥ ३०४-३०५ ॥
भीमसेनभयाद् यत्र दैवेनाभिप्रचोदितः । अपाण्डवायेति रुषा द्रौणिरस्त्रमवासृजत् ॥ ३०६ ॥ तब भीमसेनके भयसे घबराकर दैवकी प्रेरणासे पाण्डवोंके विनाशके लिये अश्वत्थामाने रोषपूर्वक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया ॥ ३०६ ॥
मैवमित्यब्रवीत् कृष्णः शमयंस्तस्य तद् वचः । यत्रास्त्रमस्त्रेण च तच्छमयामास फाल्गुनः ॥ ३०७ ॥ किंतु भगवान् श्रीकृष्णने अश्वत्थामाके रोषपूर्ण वचनको शान्त करते हुए कहा—‘मैवम्’—‘पाण्डवोंका विनाश न हो।’ साथ ही अर्जुनने अपने दिव्यास्त्रद्वारा उसके अस्त्रको शान्त कर दिया ॥ ३०७ ॥
द्रौणेश्च द्रोहबुद्धित्वं वीक्ष्य पापात्मनस्तदा । द्रौणिद्वैपायनादीनां शापाश्चान्योन्यकारिताः ॥ ३०८ ॥ उस समय पापात्मा द्रोणपुत्रके द्रोहपूर्ण विचारको देखकर द्वैपायन व्यास एवं श्रीकृष्णने अश्वत्थामाको और अश्वत्थामाने उन्हें शाप दिया। इस प्रकार दोनों ओरसे एक-दूसरेको शाप प्रदान किया गया ॥ ३०८ ॥
मणिं तथा समादाय द्रोणपुत्रान्महारथात् । पाण्डवाः प्रददुहृष्टा द्रौपद्यै जितकाशिनः ॥ ३०९ ॥