महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंममैते पुरुषा नित्यं कथयन्ति पुनः पुनः । रमणीयतमं लोके नगरं वारणावतम् ॥ ७ ॥ ‘बेटो! तुमलोगोंने सम्पूर्ण शास्त्र पढ़ लिये। आचार्य द्रोण और कृपसे अस्त्र-शस्त्रोंकी भी विशेष-रूपसे शिक्षा प्राप्त कर ली। प्रिय पाण्डवो! ऐसी दशामें मैं एक बात सोच रहा हूँ। सब ओरसे राज्यकी रक्षा, राजकीय व्यवहारोंकी रक्षा तथा राज्यके निरन्तर हित-साधनमें लगे रहनेवाले मेरे ये मन्त्रीलोग प्रतिदिन बारंबार कहते हैं कि वारणावत नगर संसारमें सबसे अधिक सुन्दर है ॥ ७ ॥ ते ताता यदि मन्यध्वमुत्सवं वारणावते । सगणाः सान्वयाश्चैव विहरध्वं यथामराः ॥ ८ ॥ ‘पुत्रो! यदि तुमलोग वारणावत नगरमें उत्सव देखने जाना चाहो तो अपने कुटुम्बियों और सेवकवर्गके साथ वहाँ जाकर देवताओंकी भाँति विहार करो ॥ ८ ॥ ब्राह्मणेभ्यश्च रत्नानि गायकेभ्यश्च सर्वशः । प्रयच्छध्वं यथाकामं देवा इव सुवर्चसः ॥ ९ ॥ कंचित् कालं विहृत्यैवमनुभूय परां मुदम् । इदं वै हास्तिनपुरं सुखिनः पुनरेष्यथ ॥ १० ॥ ‘ब्राह्मणों और गायकोंको विशेषरूपसे रत्न एवं धन दो तथा अत्यन्त तेजस्वी देवताओंके समान कुछ कालतक वहाँ इच्छानुसार विहार करते हुए परम सुख प्राप्त करो। तत्पश्चात् पुनः सुखपूर्वक इस हस्तिनापुर नगरमें ही चले आना’ ॥ ९-१० ॥
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्य तं काममनुबुध्य युधिष्ठिरः । आत्मनश्चासहायत्वं तथेति प्रत्युवाच तम् ॥ ११ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! युधिष्ठिर धृतराष्ट्रकी उस इच्छाका रहस्य समझ गये, परंतु अपनेको असहाय जानकर उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनकी बात मान ली ॥ ११ ॥ ततो भीष्मं शांतनवं विदुरं च महामतिम् । द्रोणं च बाह्निकं चैव सोमदत्तं च कौरवम् ॥ १२ ॥ कृपमाचार्यपुत्रं च भूरिश्रवसमेव च । मान्यानन्यान्मात्यांश्च ब्राह्मणांश्च तपोधनान् ॥ १३ ॥ पुरोहितांश्च पौरांश्च गान्धारीं च यशस्विनीम् । युधिष्ठिरः शनैर्दीन उवाचेदं वचस्तदा ॥ १४ ॥ तदनन्तर युधिष्ठिरने शांतनुनन्दन भीष्म, परम बुद्धिमान् विदुर, द्रोण, बाह्निक, कुरुवंशी सोमदत्त, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, अन्यान्य माननीय मन्त्रियों, तपस्वी ब्राह्मणों,