भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1046

पुरोहितों, पुरवासियों तथा यशस्विनी गान्धारीदेवीसे मिलकर धीरे-धीरे दीनभावसे इस प्रकार कहा— ।। १२—१४ ।। रमणीये जनाकीर्णे नगरे वारणावते । सगणास्तत्र यास्यामो धृतराष्ट्रस्य शासनात् ।। १५ ।। 'हम महाराज धृतराष्ट्रकी आज्ञासे रमणीय वारणावत नगरमें, जहाँ बड़ा भारी मेला लग रहा है, परिवारसहित जानेवाले हैं ।। १५ ।। प्रसन्नमनसः सर्वे पुण्या वाचो विमुञ्चत । आशीर्भिर्बृंहितानस्मान् न पापं प्रसहिष्यते ।। १६ ।। 'आप सब लोग प्रसन्नचित्त होकर हमें अपने पुण्यमय आशीर्वाद दीजिये। आपके आशीर्वादसे हमारी वृद्धि होगी और पापका हमपर वश नहीं चल सकेगा' ।। १६ ।। एवमुक्तास्तु ते सर्वे पाण्डुपुत्रेण कौरवाः । प्रसन्नवदना भूत्वा तेऽन्ववर्तन्त पाण्डवान् ।। १७ ।। स्वस्त्यस्तु वः पथि सदा भूतेभ्यश्चैव सर्वशः । मा च वोऽस्त्वशुभं किंचित् सर्वशः पाण्डुनन्दनाः ।। १८ ।। पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके इस प्रकार कहनेपर वे समस्त कुरुवंशी प्रसन्नवदन होकर पाण्डवोंके अनुकूल हो कहने लगे—'पाण्डुकुमारो! मार्गमें सर्वदा सब प्राणियोंसे तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें कहींसे किसी प्रकारका अशुभ न प्राप्त हो' ।। १७-१८ ।। ततः कृतस्वस्त्ययना राज्यलम्भाय पार्थिवाः । कृत्वा सर्वाणि कार्याणि प्रययुर्वारणावतम् ।। १९ ।। तब राज्य-लाभके लिये स्वस्तिवाचन करा समस्त आवश्यक कार्य पूर्ण करके राजकुमार पाण्डव वारणावत नगरको गये ।। १९ ।।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि वारणावतयात्रायां द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४२ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें वारणावतयात्राविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४२ ।। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल २१ श्लोक हैं)