भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1049

‘सन तथा राल आदि, जो कोई भी आग भड़कानेवाले द्रव्य संसारमें हैं, उन सबको उस मकानकी दीवारोंमें लगवाना ॥ ९ ॥ सर्पिस्तैलवसाभिश्च लाक्षया चाप्यनल्पया । मृत्तिकां मिश्रयित्वा त्वं लेपं कुड्येषु दापय ॥ १० ॥ ‘घी, तेल, चर्बी तथा बहुत-सी लाह मिट्टीमें मिलवाकर उसीसे दीवारोंको लिपवाना ॥ १० ॥ शणं तैलं घृतं चैव जतु दारूणि चैव हि । तस्मिन् वेश्मनि सर्वाणि निक्षिपेथाः समन्ततः ॥ ११ ॥ यथा च तन्न पश्येरन् परीक्षन्तोऽपि पाण्डवाः । आग्नेयमिति तत् कार्यमपि चान्येऽपि मानवाः ॥ १२ ॥ वेश्मन्येवं कृते तत्र गत्वा तान् परमार्चितान् । वासयेथाः पाण्डवेयान् कुन्तीं च ससुहृज्जनाम् ॥ १३ ॥ ‘उस घरके चारों ओर सन, तेल, घी, लाह और लकड़ी आदि सब वस्तुएँ संग्रह करके रखना। अच्छी तरह देखभाल करनेपर भी पाण्डवों तथा दूसरे लोगोंको भी इस बातकी शंका न हो कि यह घर आग भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है, इस तरह पूरी सावधानीके साथ उस राजभवनका निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार महल बन जानेपर जब पाण्डव वहाँ जायँ, तब उन्हें तथा सुहृदोंसहित कुन्तीदेवीको भी बड़े आदर-सत्कारके साथ उसीमें रखना ॥ ११—१३ ॥ आसनानि च दिव्यानि यानानि शयनानि च । विधातव्यानि पाण्डूनां यथा तुष्येत वै पिता ॥ १४ ॥ यथा च तन्न जानन्ति नगरे वारणावते । तथा सर्वं विधातव्यं यावत् कालस्य पर्ययः ॥ १५ ॥ ‘वहाँ पाण्डवोंके लिये दिव्य आसन, सवारी और शय्या आदिकी ऐसी (सुन्दर) व्यवस्था कर देना, जिसे सुनकर मेरे पिताजी संतुष्ट हों। जबतक समय बदलनेके साथ ही अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धि न हो जाय, तबतक सब काम इस तरह करना चाहिये कि वारणावत नगरके लोगोंको इसके विषयमें कुछ भी ज्ञात न हो सके ॥ १४-१५ ॥ ज्ञात्वा च तान् सुविश्वस्ताञ्शयानानकुतोभयान् । अग्निस्त्वया ततो देयो द्वारतस्तस्य वेश्मनः ॥ १६ ॥ ‘जब तुम्हें यह भलीभाँति ज्ञात हो जाय कि पाण्डवलोग यहाँ विश्वस्त होकर रहने लगे हैं, इनके मनमें कहींसे कोई खटका नहीं रह गया है, तब उनके सो जानेपर घरके दरवाजेकी ओरसे आग लगा देना ॥ १६ ॥ दह्यमाने स्वके गेहे दग्धा इति ततो जनाः । न गर्हेयुरस्मान् वै पाण्डवार्थाय कर्हिचित् ॥ १७ ॥