भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1101, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1101

(तत्पश्चात्) उसने अपनी बहिनके मनुष्योचित रूपकी ओर दृष्टिपात किया। उसने अपनी चोटीमें फूलोंके गजरे लगा रखे थे। उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर जान पड़ता था। उसकी भौंहें, नासिका, नेत्र और केशान्तभाग—सभी सुन्दर थे। नख और त्वचा बहुत ही सुकुमार थी। उसने अपने अंगोंको समस्त आभूषणोंसे विभूषित कर रखा था तथा शरीरपर अत्यन्त सुन्दर महीन साड़ी शोभा पा रही थी ।। १३-१४ ।। तां तथा मानुषं रूपं बिभ्रतीं सुमनोहरम् । पुंस्कामां शङ्कमानश्च चुक्रोध पुरुषादकः ।। १५ ।। उसे इस प्रकार सुन्दर एवं मनोहर मानव-रूप धारण किये देख राक्षसके मनमें यह संदेह हुआ कि हो-न-हो यह पतिरूपमें किसी पुरुषका वरण करना चाहती है। यह विचार मनमें आते ही वह कुपित हो उठा ।। १५ ।। संक्रुद्धो राक्षसस्तस्या भगिन्याः कुरुसत्तम । उत्फाल्य विपुले नेत्रे ततस्तामिदमब्रवीत् ।। १६ ।। कुरुश्रेष्ठ! अपनी बहिनपर उस राक्षसका क्रोध बहुत बढ़ गया था। फिर तो उसने बड़ी-बड़ी आँखें फाड़-फाड़कर उसकी ओर देखते हुए कहा— ।। १६ ।। को हि मे भोक्तुकामस्य विघ्नं चरति दुर्मतिः । न बिभेषि हिडिम्बे किं मत्कोपाद् विप्रमोहिता ।। १७ ।। 'हिडिम्बे! मैं (भूखा हूँ और) भोजन चाहता हूँ। कौन दुर्बुद्धि मानव मेरे इस अभीष्टकी सिद्धिमें विघ्न डाल रहा है। तू अत्यन्त मोहके वशीभूत होकर क्या मेरे क्रोधसे नहीं डरती है? ।। १७ ।। धिक् त्वामसति पुंस्कामे मम विप्रियकारिणि । पूर्वेषां राक्षसेन्द्राणां सर्वेषामयशस्करि ।। १८ ।। 'मनुष्यको पति बनानेकी इच्छा रखकर मेरा अप्रिय करनेवाली दुराचारिणी! तुझे धिक्कार है। तू पूर्ववर्ती सम्पूर्ण राक्षसराजोंके कुलमें कलंक लगानेवाली है ।। १८ ।। यानिमानास्थिताकार्षीर्विप्रियं सुमहन्मम । एष तानद्य वै सर्वान् हनिष्यामि त्वया सह ।। १९ ।। 'जिन लोगोंका आश्रय लेकर तूने मेरा महान् अप्रिय कार्य किया है, यह देख, मैं उन सबको आज तेरे साथ ही मार डालता हूँ' ।। १९ ।। एवमुक्त्वा हिडिम्बां स हिडिम्बो लोहितेक्षणः । वधायाभिपपातैनान् दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ।। २० ।। हिडिम्बासे यों कहकर लाल-लाल आँखें किये हिडिम्ब दाँतों-से-दाँत पीसता हुआ हिडिम्बा और पाण्डवोंका वध करनेकी इच्छासे उनकी ओर झपटा ।। २० ।। तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य भीमः प्रहरतां वरः । भर्त्सयामास तेजस्वी तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। २१ ।।

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