महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयोद्धाओंमें श्रेष्ठ तेजस्वी भीम उसे इस प्रकार हिडिम्बापर टूटते देख उसकी भर्त्सना करते हुए बोले—'अरे खड़ा रह, खड़ा रह'॥ २१॥
वैशम्पायन उवाच
भीमसेनस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं प्रहसन्निव । भगिनीं प्रति संक्रुद्धमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपनी बहिनपर अत्यन्त क्रुद्ध हुए उस राक्षसकी ओर देखकर भीमसेन हँसते हुए-से इस प्रकार बोले— ॥ २२ ॥
किं ते हिडिम्ब एतैर्वा सुखसुप्तैः प्रबोधितैः । मामासादय दुर्बुद्धे तरसा त्वं नराशन ॥ २३ ॥ 'हिडिम्ब! सुखपूर्वक सोये हुए मेरे इन भाइयोंको जगानेसे तेरा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा। खोटी बुद्धिवाले नरभक्षी राक्षस! तू पूरे वेगसे आकर मुझसे भिड़ ॥ २३ ॥
मय्येव प्रहरेहि त्वं न स्त्रियं हन्तुमर्हसि । विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ २४ ॥ 'आ, मुझपर ही प्रहार कर। हिडिम्बा स्त्री है, इसे मारना उचित नहीं है—विशेषतः इस दशामें, जबकि इसने कोई अपराध नहीं किया है। तेरा अपराध तो दूसरेके द्वारा हुआ है ॥ २४ ॥
न हीयं स्ववशा बाला कामयत्यद्य मामिह । चोदितैषा ह्यनङ्गेन शरीरान्तरचारिणा ॥ २५ ॥ 'यह भोली-भाली स्त्री अपने वशमें नहीं है। शरीरके भीतर विचरनेवाले कामदेवसे प्रेरित होकर आज यह मुझे अपना पति बनाना चाहती है ॥ २५ ॥
भगिनी तव दुर्वृत्त रक्षसां वै यशोहर । त्वन्नियोगेन चैवेयं रूपं मम समीक्ष्य च ॥ २६ ॥ कामयत्यद्य मां भीरुस्तव नैषापराध्यति । अनङ्गेन कृते दोषे नेमां गर्हितुमर्हसि ॥ २७ ॥ 'राक्षसोंकी कीर्तिको नष्ट करनेवाले दुराचारी हिडिम्ब! तेरी यह बहिन तेरी आज्ञासे ही यहाँ आयी है; परंतु मेरा रूप देखकर यह बेचारी अब मुझे चाहने लगी है, अतः तेरा कोई अपराध नहीं कर रही है। कामदेवके द्वारा किये हुए अपराधके कारण तुझे इसकी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ २६-२७ ॥
मयि तिष्ठति दुष्टात्मन् न स्त्रियं हन्तुमर्हसि । संगच्छस्व मया सार्धमेकेनैको नराशन ॥ २८ ॥ 'दुष्टात्मन्! तू मेरे रहते इस स्त्रीको नहीं मार सकता। नरभक्षी राक्षस! तू मुझ अकेलेके साथ अकेला ही भिड़ जा ॥ २८ ॥