महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहमेको नयिष्यामि त्वामद्य यमसादनम् । अद्य मद्द्बलनिष्पिष्टं शिरो राक्षस दीर्यताम् । कुञ्जरस्येव पादेन विनिष्पिष्टं बलीयसः ॥ २९ ॥ ‘आज मैं अकेला ही तुझे यमलोक भेज दूँगा। निशाचर! जैसे अत्यन्त बलवान् हाथीके पैरसे दबकर किसीका भी मस्तक पिस जाता है, उसी प्रकार मेरे बलपूर्वक आघातसे कुचला जाकर तेरा सिर फट जायगा ॥ २९ ॥
अद्य गात्राणि ते कङ्काः श्येना गोमायवस्तथा । कर्षन्तु भुवि संहृष्टा निहतस्य मया मृधे ॥ ३० ॥ ‘आज मेरे द्वारा युद्धमें तेरा वध हो जानेपर हर्षमें भरे हुए गीध, बाज और गीदड़ धरतीपर पड़े हुए तेरे अंगोंको इधर-उधर घसीटेंगे ॥ ३० ॥
क्षणेनाद्य करिष्येऽहमिदं वनमराक्षसम् । पुरा यद् दूषितं नित्यं त्वया भक्षयता नरान् ॥ ३१ ॥ ‘आजसे पहले सदा मनुष्योंको खा-खाकर तूने जिसे अपवित्र कर दिया है, उसी वनको आज मैं क्षणभरमें राक्षसोंसे सूना कर दूँगा ॥ ३१ ॥
अद्य त्वां भगिनी रक्षः कृष्यमाणं मयासकृत् । द्रक्ष्यत्यद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाद्विपम् ॥ ३२ ॥ ‘राक्षस! जैसे सिंह पर्वताकार महान् गजराजको घसीट ले जाता है, उसी प्रकार आज मेरे द्वारा बार-बार घसीटे जानेवाले तुझको तेरी बहिन अपनी आँखों देखेगी ॥ ३२ ॥
निराबाधास्त्वयि हते मया राक्षसपांसन । वनमेतच्चरिष्यन्ति पुरुषा वनचारिणः ॥ ३३ ॥ ‘राक्षसकुलांगार! मेरे द्वारा तेरे मारे जानेपर वनवासी मनुष्य बिना किसी विघ्न-बाधाके इस वनमें विचरण करेंगे’ ॥ ३३ ॥
हिडिम्ब उवाच
गर्जितेन वृथा किं ते कत्थितेन च मानुष । कृत्वैतत् कर्मणा सर्वं कत्थेथा मा चिरं कृथाः ॥ ३४ ॥ **हिडिम्ब बोला—**अरे ओ मनुष्य! व्यर्थ गर्जने तथा बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? यह सब कुछ पहले करके दिखा, फिर डींग हाँकना; अब देर न कर ॥ ३४ ॥
बलिनं मन्यसे यच्चाप्यात्मानं सपराक्रमम् । ज्ञास्यस्यद्य समागम्य मयाऽऽत्मानं बलाधिकम् ॥ ३५ ॥ न तावदेतान् हिंसिष्ये स्वपन्त्वेते यथासुखम् । एष त्वामेव दुर्बुद्धे निहन्म्यद्याप्रियंवदम् ॥ ३६ ॥ पीत्वा तवासृग् गात्रेभ्यस्ततः पश्चादिमानपि ।