महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुभे! उन्हें देखते ही समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरनेवाले कामदेवसे प्रेरित होकर मैं आपके पुत्रकी वशवर्तिनी हो गयी ।। ८ ।। ततो वृतो मया भर्ता तव पुत्रो महाबलः । अपनेतुं च यतितो न चैव शक्तितो मया ।। ९ ।। तदनन्तर मैंने आपके महाबली पुत्रको पतिरूपमें वरण कर लिया और इस बातके लिये प्रयत्न किया कि उन्हें (तथा आप सब लोगोंको) लेकर यहाँसे अन्यत्र भाग चलूँ, परंतु आपके पुत्रकी स्वीकृति न मिलनेसे मैं इस कार्यमें सफल न हो सकी ।। ९ ।। चिरायमाणां मां ज्ञात्वा ततः स पुरुषादकः । स्वयमेवागतो हन्तुमिमान् सर्वांस्तवात्मजान् ।। १० ।। मेरे लौटनेमें देर होती जान वह मनुष्यभक्षी राक्षस स्वयं ही आपके इन सब पुत्रोंको मार डालनेके लिये आया ।। १० ।। स तेन मम कान्तेन तव पुत्रेण धीमता । बलादितो विनिष्पिष्य व्यपनीतो महात्मना ।। ११ ।। परंतु मेरे प्राणवल्लभ तथा आपके बुद्धिमान् पुत्र महात्मा भीम उसे बलपूर्वक यहाँसे रगड़ते हुए दूर हटा ले गये हैं ।। ११ ।। विकर्षन्तौ महावेगौ गर्जमानौ परस्परम् । पश्यैवं युधि विक्रान्तावेतौ च नरराक्षसौ ।। १२ ।। देखिये, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले वे दोनों मनुष्य और राक्षस जोर-जोरसे गर्ज रहे हैं और बड़े वेगसे गुत्थम-गुत्थ होकर एक-दूसरेको अपनी ओर खींच रहे हैं ।। १२ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्याः श्रुत्वैव वचनमुत्पपात युधिष्ठिरः । अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवश्च वीर्यवान् ।। १३ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! हिडिम्बाकी यह बात सुनते ही युधिष्ठिर उछलकर खड़े हो गये। अर्जुन, नकुल और पराक्रमी सहदेवने भी ऐसा ही किया ।। १३ ।। तौ ते ददृशुरासक्तौ विकर्षन्तौ परस्परम् । काङ्क्षमाणौ जयं चैव सिंहाविव बलोत्कटौ ।। १४ ।। तदनन्तर उन्होंने देखा कि वे दोनों प्रचण्ड बलशाली सिंहोंकी भाँति आपसमें गुथ गये हैं और अपनी-अपनी विजय चाहते हुए एक-दूसरेको घसीट रहे हैं ।। १४ ।। अथान्योन्यं समाश्लिष्य विकर्षन्तौ पुनः पुनः । दावाग्निधूमसदृशं चक्रतुः पार्थिवं रजः ।। १५ ।। एक-दूसरेको भुजाओंमें भरकर बार-बार खींचते हुए उन दोनों योद्धाओंने धरतीकी धूलको दावानलके धूएँके समान बना दिया ।। १५ ।।