महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1110, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसुधारेणुसंवीतौ वसुधाधरसंनिभौ ।
बभ्राजतुर्यथा शैलौ नीहारेणाभिसंवृतौ ॥ १६ ॥
दोनोंका शरीर पृथ्वीकी धूलमें सना हुआ था। दोनों ही पर्वतोंके समान विशालकाय थे। उस समय वे दोनों कुहरेसे ढँके हुए दो पहाड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १६ ॥
राक्षसेन तदा भीमं क्लिश्यमानं निरीक्ष्य च ।
उवाचेदं वचः पार्थः प्रहसञ्छनकैख्विव ॥ १७ ॥
भीमसेनको राक्षसद्वारा पीड़ित देख अर्जुन धीरे-धीरे हँसते हुए-से बोले— ॥ १७ ॥
भीम मा भैर्महाबाहो न त्वां बुध्यामहे वयम् ।
समेतं भीमरूपेण रक्षसा श्रमकर्शितम् ॥ १८ ॥
‘महाबाहु भैया भीमसेन! डरना मत; अबतक हमलोग नहीं जानते थे कि तुम भयंकर राक्षससे भिड़कर अत्यन्त परिश्रमके कारण कष्ट पा रहे हो ॥ १८ ॥
साहाय्येऽस्मि स्थितः पार्थ पातयिष्यामि राक्षसम् ।
नकुलः सहदेवश्च मातरं गोपयिष्यतः ॥ १९ ॥
‘कुन्तीनन्दन! अब मैं तुम्हारी सहायताके लिये उपस्थित हूँ। इस राक्षसको अवश्य मार गिराऊँगा। नकुल और सहदेव माताजीकी रक्षा करेंगे’ ॥ १९ ॥
भीम उवाच
उदासीनो निरीक्षस्व न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया ।
न जात्वयं पुनर्जीवेन्मद्बाह्वन्तरमागतः ॥ २० ॥
भीमसेनने कहा— अर्जुन! तटस्थ होकर चुपचाप देखते रहो। तुम्हें घबरानेकी आवश्यकता नहीं। मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें आकर अब यह राक्षस कदापि जीवित नहीं रह सकता ॥ २० ॥
अर्जुन उवाच
किमनेन चिरं भीम जीवता पापरक्षसा ।
गन्तव्ये न चिरं स्थातुमिह शक्यमरिंदम ॥ २१ ॥
अर्जुनने कहा— शत्रुओंका दमन करनेवाले भीम! इस पापी राक्षसको देरतक जीवित रखनेसे क्या लाभ? हमलोगोंको आगे चलना है, अतः यहाँ अधिक समयतक ठहरना सम्भव नहीं है ॥ २१ ॥
पुरा संरज्यते प्राची पुरा संध्या प्रवर्तते ।
रौद्रे मुहूर्ते रक्षांसि प्रबलानि भवन्त्युत ॥ २२ ॥
उधर सामने पूर्वदिशामें अरुणोदयकी लालिमा फैल रही है। प्रातःसंध्याका समय होनेवाला है। इस रौद्र मुहूर्तमें राक्षस प्रबल हो जाते हैं ॥ २२ ॥
त्वरस्व भीम मा क्रीड जहि रक्षो बिभीषणम् ।