भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1169, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1169

उवाच नगरान् सर्वानिदं विप्रर्षभस्तदा ॥ १५ ॥
इस प्रकार उनके बार-बार पूछनेपर उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने पाण्डवोंको गुप्त रखते हुए समस्त नागरिकोंसे इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥
आज्ञापितं मामशने रुदन्तं सह बन्धुभिः ।
ददर्श ब्राह्मणः कश्चिन्मन्त्रसिद्धो महामनाः ॥ १६ ॥
‘कल जब मुझे भोजन पहुँचानेकी आज्ञा मिली, उस समय मैं अपने बन्धुजनोंके साथ रो रहा था। इस दशामें मुझे एक विशाल हृदयवाले मन्त्रसिद्ध ब्राह्मणने देखा ॥ १६ ॥
परिपृच्छ्य स मां पूर्वं परिक्लेशं पुरस्य च ।
अब्रवीद् ब्राह्मणश्रेष्ठो विश्वास्य प्रहसन्निव ॥ १७ ॥
‘देखकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणदेवताने पहले मुझसे सम्पूर्ण नगरके कष्टका कारण पूछा। इसके बाद अपनी अलौकिक शक्तिका विश्वास दिलाकर हँसते हुए-से कहा— ॥ १७ ॥
प्रापयिष्याम्यहं तस्मा अन्नमेतद् दुरात्मने ।
मन्निमित्तं भयं चापि न कार्यमिति चाब्रवीत् ॥ १८ ॥
‘ब्रह्मन्! आज मैं स्वयं ही उस दुरात्मा राक्षसके लिये भोजन ले जाऊँगा।’ उन्होंने यह भी बताया कि ‘आपको मेरे लिये भय नहीं करना चाहिये’ ॥ १८ ॥
स तदन्नमुपादाय गतो बकवनं प्रति ।
तेन नूनं भवेदेतत् कर्म लोकहितं कृतम् ॥ १९ ॥
‘वे वह भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके वनकी ओर गये। अवश्य उन्होंने ही यह लोक-हितकारी कर्म किया होगा’ ॥ १९ ॥
ततस्ते ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च सुविस्मिताः ।
वैश्याः शूद्राश्च मुदिताश्चक्रुर्ब्रह्ममहं तदा ॥ २० ॥
तब तो वे सब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आश्चर्यचकित हो आनन्दमें निमग्न हो गये। उस समय उन्होंने ब्राह्मणोंके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव मनाया ॥ २० ॥
ततो जानपदाः सर्वे आजग्मुर्नगरं प्रति ।
तदद्भुततमं द्रष्टुं पार्थास्तत्रैव चावसन् ॥ २१ ॥
इसके बाद उस अद्भुत घटनाको देखनेके लिये जनपदमें रहनेवाले सब लोग नगरमें आये और पाण्डवलोग भी (पूर्ववत्) वहीं निवास करने लगे ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकवधे त्रिषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत बकवधपर्वमें बकासुरवधविषयक एक सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६३ ॥