महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1203, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरद्वाजसे इसे अग्निवेश्यने और अग्निवेश्यसे मेरे गुरु द्रोणाचार्यने प्राप्त किया है। फिर विप्रवर द्रोणाचार्यने यह उत्तम अस्त्र मुझे प्रदान किया ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह । प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत् ॥ ३१ ॥ विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबलः । अस्त्रतेजःप्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ॥ ३२ ॥ शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजयः । भ्रातॄन् प्रति चकर्षार्थ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ॥ ३३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो गन्धर्वपर वह प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र चला दिया। उस अस्त्रने गन्धर्वके रथको जलाकर भस्म कर दिया। वह रथहीन गन्धर्व व्याकुल हो गया और अस्त्रके तेजसे मूढ़ होकर नीचे मुँह किये गिरने लगा। महाबली अर्जुनने उसके फूलकी मालाओंसे सुशोभित केश पकड़ लिये और घसीटकर अपने भाइयोंके पास ले आये। अस्त्रके आघातसे वह गन्धर्व अचेत हो गया था ॥ ३१-३३ ॥
युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी । नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ॥ ३४ ॥ उस गन्धर्वकी पत्नीका नाम कुम्भीनसी था। उसने अपने पतिके जीवनकी रक्षाके लिये महाराज युधिष्ठिरकी शरण ली ॥ ३४ ॥
गन्धर्व्युवाच
त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुञ्च मे । गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ॥ ३५ ॥ **गन्धर्वी बोली—**महाभाग! मेरी रक्षा कीजिये और मेरे इन पतिदेवको आप छोड़ दीजिये। प्रभो! मैं गन्धर्वपत्नी कुम्भीनसी आपकी शरणमें आयी हूँ ॥ ३५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् । को निहन्याद् रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन ॥ ३६ ॥ **युधिष्ठिरने कहा—**तात! शत्रुसूदन अर्जुन! यह गन्धर्व युद्धमें हार गया और अपना यश खो चुका। अब स्त्री इसकी रक्षिका बनकर आयी है। यह स्वयं कोई पराक्रम नहीं कर सकता। ऐसे दीन-हीन शत्रुको कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो ॥ ३६ ॥
अर्जुन उवाच