महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1204, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंजीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः । प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥ **अर्जुन बोले—**गन्धर्व! जीवन धारण करो। जाओ, अब शोक न करो। इस समय कुरुराज युधिष्ठिर तुम्हें अभयदान दे रहे हैं ॥ ३७ ॥
गन्धर्व उवाच
जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् । न च श्लाघे बलेनाङ्ग न नाम्ना जनसंसदि ॥ ३८ ॥ **गन्धर्वने कहा—**अर्जुन! मैं परास्त हो गया, अतः अपने पहले नाम अंगारपर्णको छोड़ देता हूँ। अब मैं जनसमुदायमें अपने बलकी श्लाघा नहीं करूँगा और न इस नामसे अपना परिचय ही दूँगा ॥ ३८ ॥ साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् । गान्धर्व्या माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ॥ ३९ ॥ (आजकी पराजयसे) मुझे सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि मैंने दिव्यास्त्रधारी अर्जुनको (मित्ररूपमें) प्राप्त किया है और अब मैं इन्हें गन्धर्वोंकी मायासे संयुक्त करना चाहता हूँ ॥ ३९ ॥ अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः । सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ॥ ४० ॥ इनके दिव्यास्त्रकी अग्निसे मेरा यह विचित्र एवं उत्तम रथ दग्ध हो गया है। पहले मैं विचित्र रथके कारण 'चित्ररथ' कहलाता था; परंतु अब मेरा नाम 'दग्धरथ' हो गया ॥ ४० ॥ सम्भृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा । निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ॥ ४१ ॥ मैंने पूर्वकालमें यहाँ तपस्याद्वारा जो यह विद्या प्राप्त की है, उसे आज अपने प्राणदाता महात्मा मित्रको अर्पित करूँगा ॥ ४१ ॥ संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् । यो रिपुं योजयेत् प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ॥ ४२ ॥ जिन्होंने अपने वेगसे शत्रु की शक्तिको कुण्ठित करके उसपर विजय पायी और फिर जब वह शत्रु शरणमें आ गया, तब जो उसे प्राणदान दे रहे हैं, वे किस कल्याणकी प्राप्तिके अधिकारी नहीं हैं? ॥ ४२ ॥ चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः । ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ॥ ४३ ॥