भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1205, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1205

यह चाक्षुषी नामक विद्या है, जिसे मनुने सोमको दिया। सोमने विश्वावसुको दिया और विश्वावसुने मुझे प्रदान किया है ।। ४३ ।। सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति । आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे ।। ४४ ।। यह गुरुकी दी हुई विद्या यदि किसी कायरको मिल गयी तो नष्ट हो जाती है। (इस प्रकार) मैंने इसके उपदेशकी परम्पराका वर्णन किया है। अब इसका बल भी मुझसे सुन लीजिये ।। ४४ ।। यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत् त्रिषु लोकेषु किंचन । तत् पश्येद् यादृशं चेच्छेत् तादृशं द्रष्टुमर्हति ।। ४५ ।। तीनों लोकोंमें जो कोई भी वस्तु है, उसमेंसे जिस वस्तुको आँखसे देखनेकी इच्छा हो, उसे इस विद्याके प्रभावसे कोई भी देख सकता है और जिस रूपमें देखना चाहे, उसी रूपमें देख सकता है ।। ४५ ।। एकपादेन षण्मासान् स्थितो विद्यां लभेदिमाम् । अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रतेऽकृते ।। ४६ ।। जो एक पैरसे छः महीनेतक खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्याको पा सकता है। परंतु आपको इस व्रतका पालन या तपस्या किये बिना ही मैं स्वयं उक्त विद्याकी प्राप्ति कराऊँगा ।। ४६ ।। विद्यया ह्यनया राजन् वयं नृभ्यो विशेषिताः । अविशिष्टाश्च देवानाम नुभावप्रदर्शिनः ।। ४७ ।। राजन्! इस विद्याके बलसे ही हमलोग मनुष्योंसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओंके तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं ।। ४७ ।। गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम । भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतम् ।। ४८ ।। पुरुषशिरोमणे! मैं आपको और आपके भाइयोंको अलग-अलग गन्धर्वलोकके सौ-सौ घोड़े भेंट करता हूँ ।। ४८ ।। देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः । क्षीणाक्षीणा भवन्त्येते न हीयन्ते च रंहसः ।। ४९ ।। वे घोड़े देवताओं और गन्धर्वोंके वाहन हैं। उनके शरीरकी कान्ति दिव्य है। वे मनके समान वेगशाली और आवश्यकताके अनुसार दुबले-मोटे होते हैं; किंतु उनका वेग कभी कम नहीं होता ।। ४९ ।। पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिबर्हणम् । दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि ।। ५० ।।

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