भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1206, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1206

पूर्वकालमें वृत्रासुरका संहार करनेके निमित्त इन्द्रके लिये जिस वज्रका निर्माण किया गया था, वृत्रासुरके मस्तकपर पड़ते ही उसके दस बड़े और सौ छोटे टुकड़े हो गये ॥ ५० ॥ ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते । लोके यशो धनं किंचित् सैव वज्रतनुः स्मृता ॥ ५१ ॥ तबसे अनेक भागोंमें बँटे हुए उस वज्रके प्रत्येक भागकी देवतालोग उपासना करते हैं। लोकमें उत्कृष्ट धन और यश आदि जो कुछ भी वस्तु है, उसे वज्रका स्वरूप माना गया है ॥ ५१ ॥ वज्रपाणिर्ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् । वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः ॥ ५२ ॥ (अग्निमें आहुति देनेके कारण) ब्राह्मणका दाहिना हाथ वज्र है। क्षत्रियका रथ वज्र है। वैश्यलोग जो दान करते हैं, वह भी वज्र है और शूद्रलोग जो सेवाकार्य करते हैं, उसे भी वज्र ही समझना चाहिये ॥ ५२ ॥ क्षत्रवज्रस्य भागेन अवध्या वाजिनः स्मृताः । रथाङ्गं वडवा सूते शूरांश्चाश्वेषु ये मताः ॥ ५३ ॥ क्षत्रियके रथरूपी वज्रका एक विशिष्ट अंग होनेसे घोड़ोंको अवध्य बताया गया है। गन्धर्वदेशकी घोड़ी रथको वहन करनेवाले रथांगस्वरूप (वज्रस्वरूप) घोड़ेको जन्म देती है। वे घोड़े सब अश्वोंमें शूरवीर माने जाते हैं ॥ ५३ ॥ कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः । इति गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति मे हयाः ॥ ५४ ॥ गन्धर्व-देशके घोड़ोंकी यह विशेषता है कि वे इच्छानुसार अपना रंग बदल लेते हैं। सवारकी इच्छाके अनुसार अपने वेगको घटा-बढ़ा सकते हैं। जब आवश्यकता या इच्छा हो, तभी वे उपस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार मेरे गन्धर्वदेशीय घोड़े आपकी इच्छापूर्ण करते रहेंगे ॥ ५४ ॥

अर्जुन उवाच यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा । विद्याधनं श्रुतं वापि न तद् गन्धर्व रोचये ॥ ५५ ॥ **अर्जुनने कहा—**गन्धर्व! यदि तुमने प्रसन्न होकर अथवा प्राणसंकटसे बचानेके कारण मुझे विद्या, धन अथवा शास्त्र प्रदान किया है तो मैं इस तरहका दान लेना पसंद नहीं करता ॥ ५५ ॥

गन्धर्व उवाच संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते ।

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व · पृष्ठ 1206, कुल 2256 में से · BharatKosha