भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1207

जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ।। ५६ ।।
**गन्धर्व बोला—**महापुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह प्रीतिका बढ़ानेवाला होता है—ऐसा देखनेमें आता है। आपने मुझे जीवनदान दिया है, इससे प्रसन्न होकर मैं आपको चाक्षुषी विद्या भेंट करता हूँ ।। ५६ ।।
त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् ।
तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ।। ५७ ।।
साथ ही आपसे भी मैं उत्तम आग्नेयास्त्र ग्रहण करूँगा। भरतकुलभूषण अर्जुन! ऐसा करनेसे ही हम दोनोंमें दीर्घकालतक समुचित सौहार्द बना रहेगा ।। ५७ ।।

अर्जुन उवाच

त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान् संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ ।
सखे तद् ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद् भयं भवेत् ।। ५८ ।।
**अर्जुनने कहा—**ठीक है, मैं यह अस्त्र-विद्या देकर तुमसे घोड़े ले लूँगा। हम दोनोंकी मैत्री सदा बनी रहे। सखे गन्धर्वराज! बताओ तो सही, तुमलोगोंसे हम मनुष्योंको क्यों भय प्राप्त होता है? ।। ५८ ।।

कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद् येन स्म धर्षिताः ।