महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिंदमाः ।। ५९ ।। गन्धर्व! हम सब लोग वेदवेत्ता हैं और शत्रुओंका दमन करनेकी शक्ति रखते हैं; फिर भी रातमें यात्रा करते समय जो तुमने हमलोगोंपर आक्रमण किया है, इसका क्या कारण है? इसपर भी प्रकाश डालो ।। ५९ ।।
गन्धर्व उवाच
अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः । यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ।। ६० ।। **गन्धर्व बोला—**पाण्डुकुमारो! आपलोग (विवाहित न होनेके कारण) त्रिविध अग्नियोंकी सेवा नहीं करते। (अध्ययन पूरा करके समावर्तन संस्कारसे सम्पन्न हो गये हैं, अतः) प्रतिदिन अग्निको आहुति भी नहीं देते। आपके आगे कोई ब्राह्मण पुरोहित भी नहीं है। इन्हीं कारणोंसे मैंने आपपर आक्रमण किया है ।। ६० ।।
(जानता च मया तस्मात् तेजश्चाभिजनं च वः । इयं मतिमतां श्रेष्ठ धर्षितुं वै कृता मतिः ।। को हि वस्त्रिषु लोकेषु न वेद भरतर्षभ । स्वैर्गुणैर्विस्तृतं श्रीमद् यशोऽग्र्यं भूरिवर्चसाम् ।।) यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः । विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ।। ६१ ।। बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! इसीलिये मैंने आपलोगोंके तेज और कुलोचित प्रभावको जानते हुए भी आपपर आक्रमण करनेका विचार किया। भरतश्रेष्ठ! आपलोग महान् तेजस्वी हैं। आपने अपने गुणोंसे जिस शोभाशाली श्रेष्ठ यशका विस्तार किया है, उसे तीनों लोकोंमें कौन नहीं जानता। बुद्धिमान् यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, नाग और दानव कुरुकुलकी यशोगाथाका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं ।। ६१ ।।
नारदप्रभृतीनां तु देवर्षीणां मया श्रुतम् । गुणान् कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ।। ६२ ।। वीर! नारद आदि देवर्षियोंके मुखसे भी मैंने आपके बुद्धिमान् पूर्वजोंका गुणगान सुना है ।। ६२ ।।
स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् । इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः सुकुलस्य ते ।। ६३ ।। तथा समुद्रसे घिरी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरते हुए मैंने स्वयं भी आपके उत्तम कुलका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है ।। ६३ ।।
वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ।। ६४ ।।