भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1209

अर्जुन! तीनों लोकोंमें विख्यात यशस्वी भरद्वाजनन्दन द्रोणको भी, जो आपके वेद और धनुर्वेदके आचार्य रहे हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ॥ ६४॥ धर्मं वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा। पाण्डुं च कुरुशार्दूल षडेतान् कुरुवर्धनम्। पितॄनेतामहं पार्थ देवमानुषसत्तमान्॥ ६५॥ कुरुश्रेष्ठ! धर्म, वायु, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार तथा महाराज पाण्डु—ये छः महापुरुष कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले हैं। पार्थ! ये देवताओं तथा मनुष्योंके सिरमौर छहों व्यक्ति आपलोगोंके पिता हैं। मैं इन सबको जानता हूँ॥ ६५॥ दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः। भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः॥ ६६॥ आप सब भाई देवस्वरूप, महात्मा, समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शूरवीर हैं तथा आपलोगोंने ब्रह्मचर्यव्रतका भलीभाँति पालन किया है॥ ६६॥ उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम्। जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम्॥ ६७॥ आपलोगोंका अन्तःकरण शुद्ध है, मन और बुद्धि भी उत्तम है। पार्थ! आपके विषयमें यह सब कुछ जानते हुए भी मैंने यहाँ आक्रमण किया था॥ ६७॥ स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान् क्षन्तुमर्हति। धर्षणामात्मनः पश्यन् बाहुद्रविणमाश्रितः॥ ६८॥ कुरूनन्दन! इसका कारण यह है कि अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाला कोई भी पुरुष जब स्त्रीके समीप अपना तिरस्कार होता देखता है, तब उसे सहन नहीं कर पाता॥ ६८॥ नक्तं च बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते। यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत्॥ ६९॥ कुन्तीनन्दन! इसके सिवा एक बात यह भी है कि रातके समय हमलोगोंका बल बहुत बढ़ जाता है। इसीसे स्त्रीके साथ रहनेके कारण मुझमें क्रोधका आवेश हो गया था॥ ६९॥ सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन। येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे॥ ७०॥ तपतीके कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आपने जिस कारण युद्धमें मुझे पराजित किया है, उसे (भी) बतलाता हूँ; सुनिये॥ ७०॥ ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्त्वयि। यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया॥ ७१॥