महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1237, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंलिये उसका पीछा किया। अधिक परिश्रमके कारण उन्हें बड़ा कष्ट सहना पड़ा। नरश्रेष्ठ! वे प्याससे पीड़ित हो महर्षि वसिष्ठके आश्रममें आये। मनुष्योंमें श्रेष्ठ महाराज विश्वामित्रको आया देख पूजनीय पुरुषोंकी पूजा करनेवाले महर्षि वसिष्ठने उनका सत्कार करते हुए आतिथ्य ग्रहण करनेके लिये आमन्त्रित किया।। ५—७।।
पाद्यार्घ्याचमनीयैस्तं स्वागतेन च भारत।
तथैव परिजग्राह वन्येन हविषा तदा।। ८।।
भारत! पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्वागत-भाषण तथा वन्य हविष्य आदिसे उन्होंने विश्वामित्रजीका सत्कार किया।। ८।।
तस्याथ कामधुग् धेनुर्वसिष्ठस्य महात्मनः।
उक्ता कामान् प्रयच्छेति सा कामान् दुह्यते सदा।। ९।।
महात्मा वसिष्ठजीके यहाँ एक कामधेनु थी, जो 'अमुक-अमुक मनोरथोंको पूर्ण करो' यह कहने-पर सदा उन-उन कामनाओंको पूर्ण कर दिया करती थी।। ९।।
ग्राम्यारण्यांश्चौषधींश्च दुदुहे पय एव च।
षड्रसं चामृतनिभं रसायनमनुत्तमम्।। १०।।
भोजनीयानि पेयानि भक्ष्याणि विविधानि च।
लेह्यान्यमृतकल्पानि चोष्याणि च तथार्जुन।। ११।।
रत्नानि च महार्हाणि वासांसि विविधानि च।
तैः कामैः सर्वसम्पूर्णैः पूजितश्च महीपतिः।। १२।।
ग्रामीण तथा जंगली अन्न, फल-मूल, दूध, षड्रस भोजन, अमृतके समान मधुर परम उत्तम रसायन, खाने, पीने और चबानेयोग्य भाँति-भाँतिके पदार्थ, अमृतके समान स्वादिष्ट चटनी आदि तथा चूसनेयोग्य ईख आदि वस्तुएँ तथा भाँति-भाँतिके बहुमूल्य रत्न एवं वस्त्र आदि सब सामग्रियोंको उस कामधेनुने प्रस्तुत कर दिया। सब प्रकारसे उन सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुओंके द्वारा हे अर्जुन! राजा विश्वामित्र भलीभाँति पूजित हुए।। १०—१२।।
सामात्यः सबलश्चैव तुतोष स भृशं तदा।
षडुन्नतां सुपाश्र्वोरुं पृथुपञ्चसमावृताम्।। १३।।
उस समय वे अपनी सेना और मन्त्रियोंके साथ बहुत संतुष्ट हुए। महर्षिकी धेनुका मस्तक, ग्रीवा, जाँघें, गलकम्बल, पूँछ और थन—ये छः अंग बड़े एवं विस्तृत थे।<sup>३.</sup> उसके पार्श्वभाग तथा ऊरु बड़े सुन्दर थे। वह पाँच पृथुल अंगोंसे सुशोभित थी<sup>३</sup>।। १३।।
मण्डूकनेत्रां स्वाकारां पीनोधसमनिन्दिताम्।
सुवालधिं शङ्कुकर्णां चारुशृङ्गां मनोरमाम्।। १४।।