भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1238

उसकी आँखें मेढक-जैसी थीं। आकृति बड़ी सुन्दर थी। चारों थन मोटे और फैले हुए थे। वह सर्वथा प्रशंसाके योग्य थी। सुन्दर पूँछ, नुकीले कान और मनोहर सींगोंके कारण वह बड़ी मनोरम जान पड़ती थी ॥ १४ ॥

पुष्टायतशिरोग्रीवां विस्मितः सोऽभिवीक्ष्य ताम् । अभिनन्द्य स तां राजा नन्दिनीं गाधिनन्दनः ॥ १५ ॥

उसके सिर और गर्दन विस्तृत एवं पुष्ट थे। उसका नाम नन्दिनी था। उसे देखकर विस्मित हुए गाधिनन्दन विश्वामित्रने उसका अभिनन्दन किया ॥ १५ ॥

अब्रवीच्च भृशं तुष्टः स राजा तमृषिं तदा । अर्बुदेन गवां ब्रह्मन् मम राज्येन वा पुनः ॥ १६ ॥ नन्दिनीं सम्प्रयच्छस्व भुङ्क्ष्व राज्यं महामुने ।

और अत्यन्त संतुष्ट होकर राजा विश्वामित्रने उस समय उन महर्षिसे कहा—‘ब्रह्मन्! आप दस करोड़ गायें अथवा मेरा सारा राज्य लेकर इस नन्दिनी-को मुझे दे दें। महामुने! इसे देकर आप राज्य भोग करें’ ॥ १६ १/२ ॥

वसिष्ठ उवाच

देवतातिथिपित्रर्थं याज्यार्थं च पयस्विनी ॥ १७ ॥ अदेया नन्दिनीयं वै राज्येनापि तवानघ ।

वसिष्ठजीने कहा—अनघ! देवता, अतिथि और पितरोंकी पूजा एवं यज्ञके हविष्य आदिके लिये यह दुधारू गाय नन्दिनी अपने यहाँ रहती है, इसे तुम्हारा राज्य लेकर भी नहीं दिया जा सकता ॥ १७ १/२ ॥

विश्वामित्र उवाच

क्षत्रियोऽहं भवान् विप्रस्तपस्स्वाध्यायसाधनः ॥ १८ ॥

विश्वामित्रजी बोले—मैं क्षत्रिय राजा हूँ और आप तपस्या तथा स्वाध्यायका साधन करनेवाले ब्राह्मण हैं ॥ १८ ॥