महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणेषु कुतो वीर्यं प्रशान्तेषु धृतात्मसु । अर्बुदेन गवां यस्त्वं न ददासि ममेप्सितम् ॥ १९ ॥ स्वधर्मं न प्रहास्यामि नेष्यामि च बलेन गाम् । (क्षत्रियोऽस्मि न विप्रोऽहं बाहुवीर्योऽस्मि धर्मतः । तस्माद् भुजबलेनेमां हरिष्यामीह पश्यतः ॥) ब्राह्मण अत्यधिक शान्त और जितात्मा होते हैं। उनमें बल और पराक्रम कहाँसे आ सकता है; फिर क्या बात है जो आप मेरी अभीष्ट वस्तुको एक अर्बुद गाय लेकर भी नहीं दे रहे हैं। मैं अपना धर्म नहीं छोड़ूँगा, इस गायको बलपूर्वक ले जाऊँगा। मैं क्षत्रिय हूँ, ब्राह्मण नहीं हूँ। मुझे धर्मतः अपना बाहुबल प्रकट करनेका अधिकार है; अतः बाहुबलसे ही आपके देखते-देखते इस गायको हर ले जाऊँगा ।। १९ १/२ ।।
वसिष्ठ उवाच
बलस्थश्चासि राजा च बाहुवीर्यश्च क्षत्रियः ॥ २० ॥ यथेच्छसि तथा क्षिप्रं कुरु मा त्वं विचारय । **वसिष्ठजीने कहा—**तुम सेनाके साथ हो, राजा हो और अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाले क्षत्रिय हो। जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा शीघ्र कर डालो, विचार न करो ।। २० १/२ ।।
गन्धर्व उवाच