महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंवहीं वीरपत्नियोंके अत्यन्त करुणापूर्ण विलापका कथन है। वहीं गान्धारी और धृतराष्ट्रके क्रोधावेश तथा मूर्च्छित होनेका उल्लेख है ॥ ३१७ ॥ यत्र तान् क्षत्रियाः शूरान् संग्रामेष्वनिवर्तिनः । पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄंश्चैव ददृशुर्निहतान् रणे ॥ ३१८ ॥ उस समय उन क्षत्राणियोंने युद्धमें पीठ न दिखानेवाले अपने शूरवीर पुत्रों, भाइयों और पिताओंको रणभूमिमें मरा हुआ देखा ॥ ३१८ ॥ पुत्रपौत्रवधार्तायास्तथात्रैव प्रकीर्तिता । गान्धार्याश्चापि कृष्णेन क्रोधोपशमनक्रिया ॥ ३१९ ॥ पुत्रों और पौत्रोंके वधसे पीड़ित गान्धारीके पास आकर भगवान् श्रीकृष्णने उनके क्रोधको शान्त किया। इस प्रसंगका भी इसी पर्वमें वर्णन किया गया है ॥ ३१९ ॥ यत्र राजा महाप्राज्ञः सर्वधर्मभृतां वरः । राज्ञां तानि शरीराणि दाहयामास शास्त्रतः ॥ ३२० ॥ वहीं यह भी कहा गया है कि परम बुद्धिमान् और सम्पूर्ण धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने वहाँ मारे गये समस्त राजाओंके शरीरोंका शास्त्रविधिसे दाह-संस्कार किया और कराया ॥ ३२० ॥ तोयकर्मणि चारब्धे राज्ञामुदकदानिके । गूढोत्पन्नस्य चाख्यानं कर्णस्य पृथाऽऽत्मनः ॥ ३२१ ॥ सुतस्यैतदिह प्रोक्तं व्यासेन परमर्षिणा । एतदेकादशं पर्व शोकवैकल्यकारणम् ॥ ३२२ ॥ प्रणीतं सज्जनमनोवैकल्याश्रुप्रवर्तकम् । सप्तविंशतिरध्यायाः पर्वण्यस्मिन् प्रकीर्तिताः ॥ ३२३ ॥ श्लोकसप्तशती चापि पञ्चसप्ततिसंयुता । संख्यया भारताख्यानमुक्तं व्यासेन धीमता ॥ ३२४ ॥ तदनन्तर राजाओंको जलांजलिदानके प्रसंगमें उन सबके लिये तर्पणका आरम्भ होते ही कुन्तीद्वारा गूप्तरूपसे उत्पन्न हुए अपने पुत्र कर्णका गूढ़ वृत्तान्त प्रकट किया गया, यह प्रसंग आता है। महर्षि व्यासने ये सब बातें स्त्रीपर्वमें कही हैं। शोक और विकलताका संचार करनेवाला यह ग्यारहवाँ पर्व श्रेष्ठ पुरुषोंके चित्तको भी विह्वल करके उनके नेत्रोंसे आँसूकी धारा प्रवाहित करा देता है। इस पर्वमें सत्ताईस (२७) अध्याय कहे गये हैं। इसके श्लोकोंकी संख्या सात सौ पचहत्तर (७७५) कही गयी है। इस प्रकार परम बुद्धिमान् व्यासजीने महाभारतका यह उपाख्यान कहा है ॥ ३२१—३२४ ॥ अतः परं शान्तिपर्व द्वादशं बुद्धिवर्धनम् । यत्र निर्वेदमापन्नो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ३२५ ॥ घातयित्वा पितॄन् भ्रातॄन् पुत्रान् सम्बन्धिमातुलान् ।