भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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शान्तिपर्वणि धर्मांश्च व्याख्याताः शारतल्पिकाः ॥ ३२६ ॥ स्त्रीपर्वके पश्चात् बारहवाँ पर्व शान्तिपर्वके नामसे विख्यात है। यह बुद्धि और विवेकको बढ़ानेवाला है। इस पर्वमें यह कहा गया है कि अपने पितृतुल्य गुरुजनों, भाइयों, पुत्रों, सगे-सम्बन्धी एवं मामा आदिको मरवाकर राजा युधिष्ठिरके मनमें बड़ा निर्वेद (दुःख एवं वैराग्य) हुआ। शान्तिपर्वमें बाणशय्यापर शयन करनेवाले भीष्मजीके द्वारा उपदेश किये हुए धर्मोंका वर्णन है ॥ ३२५-३२६ ॥ राजभिर्वेदितव्यास्ते सम्यग्ज्ञानबुभुत्सुभिः । आपद्धर्मांश्च तत्रैव कालहेतुप्रदर्शिनः ॥ ३२७ ॥ यान् बुद्ध्वा पुरुषः सम्यक् सर्वज्ञत्वमवाप्नुयात् । मोक्षधर्माश्च कथिता विचित्रा बहुविस्तराः ॥ ३२८ ॥ उत्तम ज्ञानकी इच्छा रखनेवाले राजाओंको उन्हें भलीभाँति जानना चाहिये। उसी पर्वमें काल और कारणकी अपेक्षा रखनेवाले देश और कालके अनुसार व्यवहारमें लानेयोग्य आपद्धर्मोंका भी निरूपण किया गया है, जिन्हें अच्छी तरह जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है। शान्तिपर्वमें विविध एवं अद्भुत मोक्ष-धर्मोंका भी बड़े विस्तारके साथ प्रतिपादन किया गया है ॥ ३२७-३२८ ॥ द्वादशं पर्व निर्दिष्टमेतत् प्राज्ञजनप्रियम् । अत्र पर्वणि विज्ञेयमध्यायानां शतत्रयम् ॥ ३२९ ॥ त्रिंशच्चैव तथाध्याया नव चैव तपोधनाः । चतुर्दश सहस्राणि तथा सप्त शतानि च ॥ ३३० ॥ सप्त श्लोकास्तथैवात्र पञ्चविंशतिसंख्यया । अत ऊर्ध्वं च विज्ञेयमनुशासनमुत्तमम् ॥ ३३१ ॥ इस प्रकार यह बारहवाँ पर्व कहा गया है, जो ज्ञानीजनोंको अत्यन्त प्रिय है। इस पर्वमें तीन सौ उन्तालीस (३३९) अध्याय हैं और तपोधनो! इसकी श्लोक-संख्या चौदह हजार सात सौ बत्तीस (१४,७३२) है। इसके बाद उत्तम अनुशासनपर्व है, यह जानना चाहिये ॥ ३२९—३३१ ॥ यत्र प्रकृतिमापन्नः श्रुत्वा धर्मविनिश्चयम् । भीष्माद् भागीरथीपुत्रात् कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३३२ ॥ जिसमें कुरुराज युधिष्ठिर गंगानन्दन भीष्मजीसे धर्मका निश्चित सिद्धान्त सुनकर प्रकृतिस्थ हुए, यह बात कही गयी है ॥ ३३२ ॥ व्यवहारोऽत्र कार्त्स्न्येन धर्मार्थी यः प्रकीर्तितः । विविधानां च दानानां फलयोगाः प्रकीर्तिताः ॥ ३३३ ॥ इसमें धर्म और अर्थसे सम्बन्ध रखनेवाले हितकारी आचार-व्यवहारका निरूपण किया गया है। साथ ही नाना प्रकारके दानोंके फल भी कहे गये हैं ॥ ३३३ ॥