भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 128

एतदाश्रमवासाख्यं पर्वोक्तं महदद्भुतम् ॥ ३५१ ॥
नारदजीसे ही उन्होंने यदुवंशियोंके महान् संहारका समाचार सुना। यह अत्यन्त अद्भुत आश्रमवासिकपर्व कहा गया है ॥ ३५१ ॥

द्विचत्वारिंशदध्यायाः पर्वैतदभिसंख्यया ।
सहस्रमेकं श्लोकानां पञ्च श्लोकशतानि च ॥ ३५२ ॥
षडेव च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ।
अतः परं निबोधेदं मौसलं पर्व दारुणम् ॥ ३५३ ॥
इस पर्वमें अध्यायोंकी संख्या बयालीस (४२) है। तत्त्वदर्शी व्यासजीने इसमें एक हजार पाँच सौ छह (१,५०६) श्लोक रखे हैं। इसके बाद मौसलपर्वकी सूची सुनो—यह पर्व अत्यन्त दारुण है ॥ ३५२-३५३ ॥

यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शस्त्रस्पर्शहता युधि ।
ब्रह्मदण्डविनिष्पिष्टाः समीपे लवणाम्भसः ॥ ३५४ ॥
इसीमें यह बात आयी है कि वे श्रेष्ठ यदुवंशी वीर क्षारसमुद्रके तटपर आपसके युद्धमें अस्त्र-शस्त्रोंके स्पर्शमात्रसे मारे गये। ब्राह्मणोंके शापने उन्हें पहले ही पीस डाला था ॥ ३५४ ॥

आपाने पानकलिता दैवेनाभिप्रचोदिताः ।
एरकारूपिभिर्वज्रैर्निजघ्नुरितरेतरम् ॥ ३५५ ॥
उन सबने मधुपानके स्थानमें जाकर खूब पीया और नशेसे होश-हवास खो बैठे। फिर दैवसे प्रेरित हो परस्पर संघर्ष करके उन्होंने एरकारूपी वज्रसे एक-दूसरेको मार डाला ॥ ३५५ ॥

यत्र सर्वक्षयं कृत्वा तावुभौ रामकेशवौ ।
नातिचक्रामतुः कालं प्राप्तं सर्वहरं महत् ॥ ३५६ ॥
वहीं सबका संहार करके बलराम और श्रीकृष्ण दोनों भाइयोंने समर्थ होते हुए भी अपने ऊपर आये हुए सर्वसंहारकारी महान् कालका उल्लंघन नहीं किया (महर्षियोंकी वाणी सत्य करनेके लिये कालका आदेश स्वेच्छासे अंगीकार कर लिया) ॥ ३५६ ॥

यत्रार्जुनो द्वारवतीमेत्य वृष्णिविनाकृताम् ।
दृष्ट्वा विषादमगमत् परां चार्तिं नरर्षभः ॥ ३५७ ॥
वहीं यह प्रसंग भी है कि नरश्रेष्ठ अर्जुन द्वारकामें आये और उसे वृष्णिवंशियोंसे सूनी देखकर विषादमें डूब गये। उस समय उनके मनमें बड़ी पीड़ा हुई ॥ ३५७ ॥

स संस्कृत्य नरश्रेष्ठं मातुलं शौरिमात्मनः ।
ददर्श यदुवीराणामापाने वैशसं महत् ॥ ३५८ ॥
उन्होंने अपने मामा नरश्रेष्ठ वसुदेवजीका दाहसंस्कार करके आपानस्थानमें जाकर यदुवंशी वीरोंके विकट विनाशका रोमांचकारी दृश्य देखा ॥ ३५८ ॥