महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशरीरं वासुदेवस्य रामस्य च महात्मनः । संस्कारं लम्भयामास वृष्णीनां च प्रधानतः ॥ ३५९ ॥ वहाँसे भगवान् श्रीकृष्ण, महात्मा बलराम तथा प्रधान-प्रधान वृष्णिवंशी वीरोंके शरीरोंको लेकर उन्होंने उनका संस्कार सम्पन्न किया ॥ ३५९ ॥
स वृद्धबालमादाय द्वारवत्यास्ततो जनम् । ददर्शापदि कष्टायां गाण्डीवस्य पराभवम् ॥ ३६० ॥ तदनन्तर अर्जुनने द्वारकाके बालक, वृद्ध तथा स्त्रियोंको साथ ले वहाँसे प्रस्थान किया; परंतु उस दुःखदायिनी विपत्तिमें उन्होंने अपने गाण्डीव धनुषकी अभूतपूर्व पराजय देखी ॥ ३६० ॥
सर्वेषां चैव दिव्यानामस्त्राणामप्रसन्नताम् । नाशं वृष्णिकलत्राणां प्रभावाणामनित्यताम् ॥ ३६१ ॥ दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नो व्यासवाक्यप्रचोदितः । धर्मराजं समासाद्य संन्यासं समरोचयत् ॥ ३६२ ॥ उनके सभी दिव्यास्त्र उस समय अप्रसन्न-से होकर विस्मृत हो गये। वृष्णिकुलकी स्त्रियोंका देखते-देखते अपहरण हो जाना और अपने प्रभावोंका स्थिर न रहना—यह सब देखकर अर्जुनको बड़ा निर्वेद (दुःख) हुआ। फिर उन्होंने व्यासजीके वचनोंसे प्रेरित हो धर्मराज युधिष्ठिरसे मिलकर संन्यासमें अभिरुचि दिखायी ॥ ३६१-३६२ ॥
इत्येतन्मौसलं पर्व षोडशं परिकीर्तितम् । अध्यायाष्टौ समाख्याताः श्लोकानां च शतत्रयम् ॥ ३६३ ॥ श्लोकानां विंशतिश्चैव संख्यातास्तत्त्वदर्शिना । महाप्रस्थानिकं तस्मादूर्ध्वं सप्तदशं स्मृतम् ॥ ३६४ ॥ इस प्रकार यह सोलहवाँ मौसलपर्व कहा गया है। इसमें तत्त्वज्ञानी व्यासने गिनकर आठ (८) अध्याय और तीन सौ बीस (३२०) श्लोक कहे हैं। इसके पश्चात् सत्रहवाँ महाप्रस्थानिकपर्व कहा गया है ॥ ३६३–३६४ ॥
यत्र राज्यं परित्यज्य पाण्डवाः पुरुषर्षभाः । द्रौपद्या सहिता देव्या महाप्रस्थानमास्थिताः ॥ ३६५ ॥ जिसमें नरश्रेष्ठ पाण्डव अपना राज्य छोड़कर द्रौपदीके साथ महाप्रस्थानके* पथपर आ गये ॥ ३६५ ॥
यत्र तेऽग्निं ददृशिरे लौहित्यं प्राप्य सागरम् । यत्राग्निना चोदितश्च पार्थस्तस्मै महात्मने ॥ ३६६ ॥ ददौ सम्पूज्य तद् दिव्यं गाण्डीवं धनुरुत्तमम् । यत्र भ्रातॄन् निपतितान् द्रौपदीं च युधिष्ठिरः ॥ ३६७ ॥ दृष्ट्वा हित्वा जगामैव सर्वाननवलोकयन् ।