महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएतत् सप्तदशं पर्व महाप्रस्थानिकं स्मृतम् ।। ३६८ ।। उस यात्रामें उन्होंने लाल सागरके पास पहुँचकर साक्षात् अग्निदेवको देखा और उन्हींकी प्रेरणासे पार्थने उन महात्माको आदरपूर्वक अपना उत्तम एवं दिव्य गाण्डीव धनुष अर्पण कर दिया। उसी पर्वमें यह भी कहा गया है कि राजा युधिष्ठिरने मार्गमें गिरे हुए अपने भाइयों और द्रौपदीको देखकर भी उनकी क्या दशा हुई यह जाननेके लिये पीछेकी ओर फिरकर नहीं देखा और उन सबको छोड़कर आगे बढ़ गये। यह सत्रहवाँ महाप्रस्थानिकपर्व कहा गया है ।। ३६६-३६८ ।।
यत्राध्यायास्त्रयः प्रोक्ताः श्लोकानां च शतत्रयम् । विंशतिश्च तथा श्लोकाः संख्यातास्तत्त्वदर्शिना ।। ३६९ ।। इसमें तत्त्वज्ञानी व्यासजीने तीन (३) अध्याय और एक सौ तेईस (१२३) श्लोक गिनकर कहे हैं ।। ३६९ ।।
स्वर्गपर्व ततो ज्ञेयं दिव्यं यत् तदमानुषम् । प्राप्तं दैवरथं स्वर्गान्नेष्टवान् यत्र धर्मराट् ।। ३७० ।। आरोढुं सुमहाप्राज्ञ आनृशंस्याच्छुना विना । तामस्याविचलां ज्ञात्वा स्थितिं धर्मे महात्मनः ।। ३७१ ।। श्वस्वरूपं यत्र तत् त्यक्त्वा धर्मेणासौ समन्वितः । स्वर्गं प्राप्तः स च तथा यातना विपुला भृशम् ।। ३७२ ।। देवदूतेन नरकं यत्र व्याजेन दर्शितम् । शुश्राव यत्र धर्मात्मा भ्रातॄणां करुणा गिरः ।। ३७३ ।। निदेशे वर्तमानानां देशे तत्रैव वर्तताम् । अनुदर्शितश्च धर्मेण देवराजेन पाण्डवः ।। ३७४ ।। तदनन्तर स्वर्गारोहणपर्व जानना चाहिये। जो दिव्य वृत्तान्तोंसे युक्त और अलौकिक है। उसमें यह वर्णन आया है कि स्वर्गसे युधिष्ठिरको लेनेके लिये एक दिव्य रथ आया, किंतु महाज्ञानी धर्मराज युधिष्ठिरने दयावश अपने साथ आये हुए कुत्तेको छोड़कर अकेले उसपर चढ़ना स्वीकार नहीं किया। महात्मा युधिष्ठिरकी धर्ममें इस प्रकार अविचल स्थिति जानकर कुत्तेने अपने मायामय स्वरूपको त्याग दिया और अब वह साक्षात् धर्मके रूपमें स्थित हो गया। धर्मके साथ युधिष्ठिर स्वर्गमें गये। वहाँ देवदूतने व्याजसे उन्हें नरककी विपुल यातनाओंका दर्शन कराया। वहीं धर्मात्मा युधिष्ठिरने अपने भाइयोंकी करुणाजनक पुकार सुनी थी। वे सब वहीं नरकप्रदेशमें यमराजकी आज्ञाके अधीन रहकर यातना भोगते थे। तत्पश्चात् धर्मराज तथा देवराजने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको वास्तवमें उनके भाइयोंको जो सद्गति प्राप्त हुई थी, उसका दर्शन कराया ।। ३७०—३७४ ।।
आप्लुत्याकाशगङ्गायां देहं त्यक्त्वा स मानुषम् । स्वधर्मनिर्जितं स्थानं स्वर्गे प्राप्य स धर्मराट् ।। ३७५ ।।