भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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मुमुदे पूजितः सर्वैः सेन्द्रैः सुरगणैः सह । एतदष्टादशं पर्व प्रोक्तं व्यासेन धीमता ॥ ३७६ ॥ इसके बाद धर्मराजने आकाशगंगामें गोता लगाकर मानवशरीरको त्याग दिया और स्वर्गलोकमें अपने धर्मसे उपार्जित उत्तम स्थान पाकर वे इन्द्रादि देवताओंके साथ उनसे सम्मानित हो आनन्दपूर्वक रहने लगे। इस प्रकार बुद्धिमान् व्यासजीने यह अठारहवाँ पर्व कहा है ॥ ३७५-३७६ ॥ अध्यायाः पञ्च संख्याताः पर्वण्यस्मिन् महात्मना । श्लोकानां द्वे शते चैव प्रसंख्याते तपोधनाः ॥ ३७७ ॥ नव श्लोकास्तथैवान्ये संख्याताः परमर्षिणा । अष्टादशैवैतानि पर्वाण्युक्तान्यशेषतः ॥ ३७८ ॥ तपोधनो! परम ऋषि महात्मा व्यासजीने इस पर्वमें गिने-गिनाये पाँच (५) अध्याय और दो सौ नौ (२०९) श्लोक कहे हैं। इस प्रकार ये कुल मिलाकर अठारह पर्व कहे गये हैं ॥ ३७७-३७८ ॥ खिलेषु हरिवंशश्च भविष्यं च प्रकीर्तितम् । दशश्लोकसहस्राणि विंशच्छ्लोकशतानि च ॥ ३७९ ॥ खिलेषु हरिवंशे च संख्यातानि महर्षिणा । एतत् सर्वं समाख्यातं भारते पर्वसंग्रहः ॥ ३८० ॥ खिलपर्वोंमें हरिवंश तथा भविष्यका वर्णन किया गया है। हरिवंशके खिलपर्वोंमें महर्षि व्यासने गणनापूर्वक बारह हजार (१२,०००) श्लोक रखे हैं। इस प्रकार महाभारतमें यह सब पर्वोंका संग्रह बताया गया है ॥ ३७९-३८० ॥ अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया । तन्महादारुणं युद्धमहान्यष्टादशाभवत् ॥ ३८१ ॥ कुरुक्षेत्रमें युद्धकी इच्छासे अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुई थीं और वह महाभयंकर युद्ध अठारह दिनोंतक चलता रहा ॥ ३८१ ॥ यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः । न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद् विचक्षणः ॥ ३८२ ॥ जो द्विज अंगों और उपनिषदोंसहित चारों वेदोंको जानता है, परंतु इस महाभारत-इतिहासको नहीं जानता, वह विशिष्ट विद्वान् नहीं है ॥ ३८२ ॥ अर्थशास्त्रमिदं प्रोक्तं धर्मशास्त्रमिदं महत् । कामशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥ ३८३ ॥ असीम बुद्धिवाले महात्मा व्यासने यह अर्थशास्त्र कहा है। यह महान् धर्मशास्त्र भी है, इसे कामशास्त्र भी कहा गया है (और मोक्षशास्त्र तो यह है ही) ॥ ३८३ ॥ श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यन्न रोचते ।