भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1309

तस्मिंस्तु सम्भ्रान्तजने समाजे निष्क्षिप्तवादेषु जनाधिपेषु । कुन्तीसुतो जिष्णुरियेष कर्तुं सज्यं धनुस्तत् सशरं प्रवीरः ॥ २९ ॥ (जब इस प्रकार बड़े-बड़े प्रभावशाली राजा लक्ष्यवेध न कर सके, तब) सारा समाज सम्भ्रम (घबराहट)-में पड़ गया और लक्ष्यवेधकी बातचीततक बंद हो गयी, उसी समय प्रमुख वीर कुन्तीनन्दन अर्जुनने उस धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसपर बाण-संधान करनेकी अभिलाषा की ॥ २९ ॥ (ततो वरिष्ठः सुरदानवाना- मुदारधीर्वृष्णिकुलप्रवीरः । जहर्ष रामेण स पीड्य हस्तं हस्तं गतां पाण्डुसुतस्य मत्वा ॥ न जज्ञुरन्ये नृपवीरमुख्याः संछन्नरूपानथ पाण्डुपुत्रान् ।) यह देख देवता और दानवोंके आदरणीय, वृष्णि-वंशके प्रमुख वीर उदारबुद्धि भगवान् श्रीकृष्ण बल-रामजीके साथ उनका हाथ दबाते हुए बड़े प्रसन्न हुए। उन्हें यह विश्वास हो गया कि द्रौपदी अब पाण्डुनन्दन अर्जुनके हाथमें आ गयी। पाण्डवोंने अपना रूप छिपा रखा था, अतः दूसरे कोई राजा या प्रमुख वीर उन्हें पहचान न सके।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि स्वयंवरपर्वणि राजपराङ्मुखीभवने षडशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत स्वयंवरपर्वमें सम्पूर्ण राजाओंके विमुख होनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३४ १/३ श्लोक हैं)


* कर्णके द्वारा प्रत्यंचा और बाण चढ़ानेकी बात दाक्षिणात्य पाठमें कहीं नहीं है। भण्डारकरकी प्रतिमें भी मुख्य पाठमें यह वर्णन नहीं है। नीलकण्ठी पाठमें भी इससे पूर्व श्लोक १५में तथा उत्तर अ० १८७ श्लोक ४ एवं १९में भी ऐसा ही उल्लेख है कि कर्ण धनुषपर प्रत्यंचा और बाण नहीं चढ़ा सका था; इससे यही सिद्ध होता है कि कर्णने बाण नहीं चढ़ाया था।