भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1326, कुल 2256 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1326

तदनन्तर कुरुश्रेष्ठ भीमसेनने दोनों हाथोंसे शल्यको ऊपर उठाकर उस युद्धभूमिमें पटक दिया। यह देख ब्राह्मणलोग हँसने लगे ॥ २८ ॥ तत्राश्चर्यं भीमसेनश्चकार पुरुषर्षभः । यच्छल्यं पातितं भूमौ नावधीद् बलिनं बली ॥ २९ ॥ कुरुश्रेष्ठ बलवान् भीमसेनने एक आश्चर्यकी बात यह की कि महाबली शल्यको पृथ्वीपर पटककर भी मार नहीं डाला ॥ २९ ॥ पातिते भीमसेनेन शल्ये कर्णे च शङ्किते । शङ्किताः सर्वराजानः परिवव्रुर्वृकोदरम् ॥ ३० ॥ भीमसेनके द्वारा शल्यके पछाड़ दिये जाने और अर्जुनसे कर्णके डर जानेपर सभी राजा (युद्धका विचार छोड़) शंकित हो भीमसेनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ३० ॥ ऊचुश्च सहितास्तत्र साध्विमौ ब्राह्मणर्षभौ । विज्ञायेतां क्वजन्मानौ क्वनिवासौ तथैव च ॥ ३१ ॥ और एक साथ ही बोल उठे—‘अहो! ये दोनों श्रेष्ठ ब्राह्मण धन्य हैं। पता तो लगाओ, इनकी जन्मभूमि कहाँ है तथा ये रहनेवाले कहाँके हैं? ॥ ३१ ॥ को हि राधासुतं कर्णं शक्तो योधयितुं रणे । अन्यत्र रामाद् द्रोणाद् वा पाण्डवाद् वा किरीटिनः ॥ ३२ ॥ ‘परशुराम, द्रोण अथवा पाण्डुनन्दन अर्जुनके सिवा दूसरा ऐसा कौन है, जो युद्धमें राधानन्दन कर्णका सामना कर सके ॥ ३२ ॥ कृष्णाद् वा देवकीपुत्रात् कृपाद् वापि शरद्वतः । को वा दुर्योधनं शक्तः प्रतियोधयितुं रणे ॥ ३३ ॥ ‘(इसी प्रकार) देवकीनन्दन श्रीकृष्ण अथवा शरद्वान्‌के पुत्र कृपाचार्यके सिवा दूसरा कौन है, जो समरभूमिमें दुर्योधनके साथ लोहा ले सके ॥ ३३ ॥ तथैव मद्राधिपतिं शल्यं बलवतां वरम् । बलदेवाद्दृते वीरात् पाण्डवाद् वा वृकोदरात् ॥ ३४ ॥ वीराद् दुर्योधनाद् वान्यः शक्तः पातयितुं रणे । क्रियतामवहारोऽस्माद् युद्धाद् ब्राह्मणसंवृतात् ॥ ३५ ॥ ‘बलवानोंमें श्रेष्ठ मद्रराज शल्यको भी वीरवर बलदेव, पाण्डुनन्दन भीमसेन अथवा वीर दुर्योधनको छोड़कर दूसरा कौन रणभूमिमें गिरा सकता है। अतः ब्राह्मणोंसे घिरे हुए इस युद्धक्षेत्रसे हमलोगोंको हट जाना चाहिये ॥ ३४-३५ ॥ ब्राह्मणा हि सदा रक्ष्याः सापराधापि नित्यदा । अथैनानुपलभ्येह पुनर्योत्स्याम हृष्टवत् ॥ ३६ ॥