महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें‘क्योंकि ब्राह्मण अपराधी हों, तो भी सदा ही उनकी रक्षा करनी चाहिये। पहले इनका ठीक-ठीक परिचय ले लें, फिर (ये चाहें तो) हम इनके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करेंगे' ।। ३६ ।।
तांस्तथावादिनः सर्वान् प्रसमीक्ष्य क्षितीश्वरान् । अथान्यान् पुरुषांश्चापि कृत्वा तत् कर्म संयुगे ।। ३७ ।।
उन सब राजाओं तथा अन्य लोगोंको ऐसी बातें करते देख और युद्धमें वह महान् पराक्रम दिखाकर भीमसेन और अर्जुन बड़े प्रसन्न थे ।। ३७ ।।
वैशम्पायन उवाच
तत् कर्म भीमस्य समीक्ष्य कृष्णः कुन्तीसुतौ तौ परिशङ्कमानः । निवारयामास महीपतींस्तान् धर्मेण लब्धेत्यनुनीय सर्वान् ।। ३८ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीमसेनका वह अद्भुत कार्य देख भगवान् श्रीकृष्णने यह सोचते हुए कि ये दोनों भाई कुन्तीकुमार भीमसेन और अर्जुन ही हैं, उन सब राजाओंको यह समझाकर कि ‘इन्होंने धर्मपूर्वक द्रौपदीको प्राप्त किया है’ अनुनयपूर्वक युद्धसे रोका ।। ३८ ।।
एवं ते विनिवृत्तास्तु युद्धाद् युद्धविशारदाः । यथावासं ययुः सर्वे विस्मिता राजसत्तमाः ।। ३९ ।।
इस प्रकार श्रीकृष्णके समझानेसे वे सभी युद्धकुशल श्रेष्ठ नरेश युद्धसे निवृत्त हो गये और विस्मित होकर अपने-अपने डेरोंको चले गये ।। ३९ ।।
वृत्तो ब्रह्मोत्तरो रङ्गः पाञ्चाली ब्राह्मणैर्वृता । इति ब्रुवन्तः प्रययुर्ये तत्रासन् समागताः ।। ४० ।।
वहाँ जो दर्शक एकत्र हुए थे, वे ‘इस रंग-मण्डपके उत्सवसे ब्राह्मणोंकी श्रेष्ठता सिद्ध हुई; पांचालराजकुमारी द्रौपदीको ब्राह्मणोंने प्राप्त किया', यों कहते हुए (अपने-अपने निवासस्थानको) चले गये ।। ४० ।।
ब्राह्मणैस्तु प्रतिच्छन्नौ रौरवाजिनवासिभिः । कृच्छ्रेण जग्मतुस्तौ तु भीमसेनधनंजयौ ।। ४१ ।।
रुरुमृगके चर्मको वस्त्रके रूपमें धारण करनेवाले ब्राह्मणोंसे घिरे होनेके कारण भीमसेन और अर्जुन बड़ी कठिनाईसे आगे बढ़ पाते थे ।। ४१ ।।
विमुक्तौ जनसम्बाधाच्छत्रुभिः परिवीक्षितौ । कृष्णयानुगतौ तत्र नृवीरौ तौ विरेजतुः ।। ४२ ।।