महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ
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यथोचितं पुत्र मयापि चोक्तं
समेत्य भुङ्क्तेति नृप प्रमादात् ॥ ४ ॥
कुन्तीने कहा— बेटा! यह राजा द्रुपदकी कन्या द्रौपदी है। तुम्हारे छोटे भाई भीमसेन और अर्जुनने इसे भिक्षा कहकर मुझे समर्पित किया और मैंने भी (इसे देखे बिना ही) भूलसे (भिक्षा ही समझकर) अनुरूप उत्तर दे दिया—'तुम सब लोग मिलकर इसे पाओ' ॥ ४ ॥
मया कथं नानृतमुक्तमद्य
भवेत् कुरूणामृषभ ब्रवीहि ।
पाञ्चालराजस्य सुतामधर्मो
न चोपवर्तेत न विभ्रमेच्च ॥ ५ ॥
कुरुश्रेष्ठ! बताओ, अब कैसे मेरी बात झूठी न हो? और क्या किया जाय, जिससे इस पांचालराज-कुमारी कृष्णाको न तो पाप लगे और न नीच योनियोंमें ही भटकना पड़े ॥ ५ ॥
वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्तो मतिमान् नृवीरो
मात्रा मुहूर्तं तु विचिन्त्य राजा ।
कुन्तीं समाश्वास्य कुरुप्रवीरो