भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1331

धनंजयं वाक्यमिदं बभाषे ॥ ६ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! कुरुश्रेष्ठ नरवीर राजा युधिष्ठिर बड़े बुद्धिमान् थे। उन्होंने माताकी यह बात सुनकर दो घड़ीतक (मन-ही-मन) कुछ विचार किया। फिर कुन्तीदेवीको भलीभाँति आश्वासन देकर उन्होंने धनंजयसे यह बात कही— ॥ ६ ॥ त्वया जिता फाल्गुन याज्ञसेनी त्वयैव शोभिष्यति राजपुत्री । प्रज्वाल्यतामग्निरमित्रसाह गृहाण पाणिं विधिवत् त्वमस्याः ॥ ७ ॥ ‘अर्जुन! तुमने द्रौपदीको जीता है, तुम्हारे ही साथ इस राजकुमारीकी शोभा होगी। शत्रुओंका सामना करनेवाले वीर! तुम अग्नि प्रज्वलित करो और (अग्निदेवके साक्ष्यमें) विधिपूर्वक इस राजकन्याका पाणिग्रहण करो’ ॥ ७ ॥

अर्जुन उवाच

मा मां नरेन्द्र त्वमधर्मभाजं कृथा न धर्मोऽयमशिष्टदृष्टः । भवान् निवेश्यः प्रथमं ततोऽयं भीमो महाबाहुरचिन्त्यकर्मा ॥ ८ ॥ अहं ततो नकुलोऽनन्तरं मे पश्चादयं सहदेवस्तरस्वी । वृकोदरोऽहं च यमौ च राज- न्नियं च कन्या भवतो नियोज्याः ॥ ९ ॥ **अर्जुन बोले—**नरेन्द्र! आप मुझे अधर्मका भागी न बनाइये। (बड़े भाईके अविवाहित रहते छोटे भाईका विवाह हो जाय,) यह धर्म नहीं है; ऐसा व्यवहार तो अनार्योंमें देखा गया है। पहले आपका विवाह होना चाहिये; तत्पश्चात् अचिन्त्यकर्मा महाबाहु भीमसेनका और फिर मेरा। तत्पश्चात् नकुल फिर वेगवान् सहदेव विवाह कर सकते हैं। राजन्! भैया भीमसेन, मैं नकुल-सहदेव तथा यह राजकन्या—सभी आपकी आज्ञाके अधीन हैं ॥ ८-९ ॥ एवं गते यत् करणीयमत्र धर्म्यं यशस्यं कुरु तद् विचिन्त्य । पाञ्चालराजस्य हितं च यत् स्यात् प्रशाधि सर्वे स्म वशे स्थितास्ते ॥ १० ॥ ऐसी दशामें आप यहाँ अपनी बुद्धिसे विचार करके जो धर्म और यशके अनुकूल तथा पांचालराजके लिये भी हितकर कार्य हो, वह कीजिये और उसके लिये हमें आज्ञा दीजिये।