भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1351

कुन्तीदेवी सती-साध्वी कृष्णाको साथ ले द्रुपदके रनिवासमें गयीं। वहाँकी उदारहृदया स्त्रियोंने कौरवराज पाण्डुकी धर्मपत्नीका (बड़ा) आदर-सत्कार किया ॥ ९ ॥

तान् सिंहविक्रान्तगतीन् निरीक्ष्य महर्षभाक्षानजिनोत्तरीयान् । गूढोत्तरांसान् भुजगेन्द्रभोग- प्रलम्बबाहून् पुरुषप्रवीरान् ॥ १० ॥ राजा च राज्ञः सचिवाश्च सर्वे पुत्राश्च राज्ञः सुहृदस्तथैव । प्रेष्याश्च सर्वे निखिलेन राजन् हर्षं समापेतुरतीव तत्र ॥ ११ ॥

राजन्! पाण्डवोंकी चाल-ढाल सिंहके समान पराक्रमसूचक थी, उनकी आँखें साँड़के समान बड़ी-बड़ी थीं, उन्होंने काले मृगचर्मके ही दुपट्टे ओढ़ रखे थे, उनकी हँसलीकी हड्डियाँ मांससे छिपी हुई थीं और भुजाएँ नागराजके शरीरके समान मोटी एवं विशाल थीं। उन पुरुषसिंह पाण्डवोंको देखकर राजा द्रुपद, उनके सभी पुत्र, मन्त्री, इष्ट-मित्र और समस्त नौकर-चाकर ये सब-के-सब वहाँ बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ १०-११ ॥

ते तत्र वीराः परमासनेषु सपादपीठेष्वविशङ्कमानाः । यथानुपूर्वं विविशुर्नराग्र्या- स्तथा महार्हेषु न विस्मयन्तः ॥ १२ ॥

वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव वहाँ लगे हुए पादपीठसहित बहुमूल्य श्रेष्ठ सिंहासनोंपर बिना किसी हिचक या संकोचके मनमें तनिक भी विस्मय न करते हुए बड़े-छोटेके क्रमसे जा बैठे ॥ १२ ॥

उच्चावचं पार्थिवभोजनीयं पात्रीषु जाम्बूनदराजतीषु । दासाश्च दास्यश्च सुमृष्टवेषाः सम्भोजकाश्चाप्युपजह्रुरन्नम् ॥ १३ ॥

तब स्वच्छ और सुन्दर पोशाक पहने हुए दास-दासी तथा रसोइयोंने सोने-चाँदीके बरतनोंमें राजाओंके भोजन करनेयोग्य अनेक प्रकारकी सामान्य और विशेष भोजन-सामग्री लाकर परोसी ॥ १३ ॥