महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः । पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यार्थं विशाम्पते ॥ ४ ॥ कथमेका बहूनां स्याद् धर्मपत्नी न संकरः । एतन्मे भगवान् सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम् ॥ ५ ॥ राजन्! तदनन्तर दो घड़ीके बाद राजा द्रुपदने मीठी वाणी बोलकर महात्मा व्यासजीसे द्रौपदीके विषयमें पूछा—'भगवन्! एक ही स्त्री बहुत-से पुरुषोंकी धर्मपत्नी कैसे हो सकती है? जिससे संकरताका दोष न लगे, यह सब आप ठीक-ठीक बतावें' ॥ ४-५ ॥
व्यास उवाच
अस्मिन् धर्मे विप्रलब्धे लोकवेदविरोधके । यस्य यस्य मतं यद् यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत् ॥ ६ ॥ व्यासजीने कहा—अत्यन्त गहन होनेके कारण शास्त्रीय आवरणके द्वारा ढके हुए अतएव इस लोक-वेद-विरुद्ध धर्मके सम्बन्धमें तुममेंसे जिसका-जिसका जो-जो मत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥
द्रुपद उवाच
अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः । न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम ॥ ७ ॥ द्रुपद बोले—द्विजश्रेष्ठ! मेरी रायमें तो यह अधर्म ही है; क्योंकि यह लोक और वेद दोनोंके विरुद्ध है। बहुत-से पुरुषोंकी एक ही पत्नी हो, ऐसा व्यवहार कहीं भी नहीं