महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहै ।। ७ ।। न चाप्याचरितः पूर्वैरयं धर्मो महात्मभिः । न चाप्यधर्मो विद्वद्भिश्चरितव्यः कथंचन ।। ८ ।। पूर्ववर्ती महात्मा पुरुषोंने भी ऐसे धर्मका आचरण नहीं किया है और विद्वान् पुरुषोंको किसी प्रकार भी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ।। ८ ।। ततोऽहं न करोम्येनं व्यवसायं क्रियां प्रति । धर्मः सदैव संदिग्धः प्रतिभाति हि मे त्वयम् ।। ९ ।। इसलिये मैं इस धर्मविरोधी आचारको काममें नहीं लाना चाहता। मुझे तो इस कार्यके धर्मसंगत होनेमें सदा ही संदेह जान पड़ता है ।। ९ ।।
धृष्टद्युम्न उवाच
यवीयसः कथं भार्यां ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ । ब्रह्मन् सम्भविर्तेत सवृत्तः संस्तपोधन ।। १० ।। धृष्टद्युम्न बोले—द्विजश्रेष्ठ! आप ब्राह्मण हैं, तपोधन हैं; आप ही बताइये, बड़ा भाई सदाचारी होते हुए भी अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ समागम कैसे कर सकता है? ।। १० ।। न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद् गतिं विद्म कथंचन । अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो न शक्यते ।। ११ ।। कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मंस्ततोऽयं न व्यवस्यते । पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन ।। १२ ।। धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण हम उसकी गतिको सर्वथा नहीं जानते; अतः यह कार्य अधर्म है या धर्म, इसका निश्चय करना हम-जैसे लोगोंके लिये असम्भव है। ब्रह्मन्! इसीलिये हम किसी तरह भी ऐसी सम्मति नहीं दे सकते कि राजकुमारी कृष्णा पाँच पुरुषोंकी धर्मपत्नी हो ।। ११-१२ ।।
युधिष्ठिर उवाच
न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः । वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथंचन ।। १३ ।। श्रूयते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी । ऋषीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वरा ।। १४ ।। युधिष्ठिरने कहा—मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती और मेरी बुद्धि भी कभी अधर्ममें नहीं लगती; परंतु इस विवाहमें मेरे मनकी प्रवृत्ति हो रही है, इसलिये यह किसी प्रकार भी अधर्म नहीं है। पुराणोंमें भी सुना जाता है कि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जटिला नामवाली गौतम गोत्रकी कन्याने सात ऋषियोंके साथ विवाह किया था ।। १३-१४ ।।