महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिं वो भयं मानुषेभ्यो यूयं सर्वे यदामराः । मा वो मर्त्यसकाशाद् वै भयं भवितुमर्हति ॥ ५ ॥ **ब्रह्माजीने कहा—**तुम्हें मनुष्योंसे क्यों भय लगता है? जबकि तुम सभी लोग अमर हो, तब तुम्हें मरणधर्मा मनुष्योंसे कभी भयभीत नहीं होना चाहिये ॥ ५ ॥
देवा ऊचुः
मर्त्या अमर्त्याः संवृत्ता न विशेषोऽस्ति कश्चन । अविशेषादुद्विजन्तो विशेषार्थमिहागताः ॥ ६ ॥ **देवता बोले—**जो मरणशील थे, वे अमर हो गये। अब हममें और उनमें कोई अन्तर नहीं रह गया। यह अन्तर मिट जानेसे ही हमें अधिक घबराहट हो रही है। हमारी विशेषता बनी रहे, इसीलिये हम यहाँ आये हैं ॥ ६ ॥
श्रीभगवानुवाच
वैवस्वतो व्यापृतः सत्रहेतो- स्तेन त्विमे न म्रियन्ते मनुष्याः । तस्मिन्नेकाग्रे कृतसर्वकार्ये तत एषां भवितैवान्तकालः ॥ ७ ॥ वैवस्वतस्यैव तनुर्विभक्ता वीर्येण युष्माकमृत प्रयुक्ता । सैषामन्तो भविता ह्यन्तकाले न तत्र वीर्यं भविता नरेषु ॥ ८ ॥ **भगवान् ब्रह्माजीने कहा—**सूर्यपुत्र यमराज यज्ञके कार्यमें लगे हैं, इसीलिये ये मनुष्य मर नहीं रहे हैं। जब वे यज्ञका सारा काम पूरा करके इधर ध्यान देंगे, तब इन मनुष्योंका अन्तकाल उपस्थित होगा। तुमलोगोंके बलके प्रभावसे जब सूर्यनन्दन यमराजका शरीर यज्ञकार्यसे अलग होकर अपने कार्यमें प्रयुक्त होगा, तब वही अन्तकाल आनेपर मनुष्योंकी मृत्युका कारण बनेगा। उस समय मनुष्योंमें इतनी शक्ति नहीं होगी कि वे मृत्युसे अपनेको बचा सकें ॥ ७-८ ॥
व्यास उवाच
ततस्तु ते पूर्वजदेववाक्यं श्रुत्वा जग्मुर्यत्र देवा यजन्ते । समासीनास्ते समेता महाबला भागीरथ्यां ददृशुः पुण्डरीकम् ॥ ९ ॥