भारतकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 1367, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 1367

**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! तब वे अपने पूर्वज देवता ब्रह्माजीका वचन सुनकर फिर वहीं चले गये, जहाँ सब देवता यज्ञ कर रहे थे। एक दिन वे सभी महाबली देवगण गंगाजीमें स्नान करनेके लिये गये और वहाँ तटपर बैठे। उसी समय उन्हें भागीरथीके जलमें बहता हुआ एक कमल दिखायी दिया ॥ ९ ॥ दृष्ट्वा च तद् विस्मितास्ते बभूवु- स्तेषामिन्द्रस्तत्र शूरो जगाम । सोऽपश्यद् योषामथ पावकप्रभां यत्र देवी गङ्गा सततं प्रसूता ॥ १० ॥ उसे देखकर वे सब देवता चकित हो गये। उनमें सबसे प्रधान और शूरवीर इन्द्र उस कमलका पता लगानेके लिये गंगाजीके मूल-स्थानकी ओर गये। गंगोत्तरीके पास, जहाँ गंगादेवीका जल सदा अविच्छिन्नरूपसे झरता रहता है, पहुँचकर इन्द्रने एक अग्निके समान तेजस्विनी युवती देखी ॥ १० ॥ सा तत्र योषा रुदती जलार्थिनी गङ्गां देवीं व्यवगाह्य व्यतिष्ठत् । तस्याश्रुबिन्दुः पतितो जले य- स्तत् पद्ममासीदथ तत्र काञ्चनम् ॥ ११ ॥ वह युवती वहाँ जलके लिये आयी थी और भगवती गंगाकी धारामें प्रवेश करके रोती हुई खड़ी थी। उसके आँसुओंका एक-एक बिन्दु, जो जलमें गिरता था, वहाँ सुवर्णमय कमल बन जाता था ॥ ११ ॥ तदद्भुतं प्रेक्ष्य वज्री तदानी- मपृच्छत् तां योषितमन्तिकाद् वै । का त्वं भद्रे रोदिषि कस्य हेतो- र्वाक्यं तथ्यं कामयेऽहं ब्रवीहि ॥ १२ ॥ यह अद्भुत दृश्य देखकर वज्रधारी इन्द्रने उस समय उस युवतीके निकट जाकर पूछा—'भद्रे! तुम कौन हो और किसलिये रोती हो? बताओ, मैं तुमसे सच्ची बात जानना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥ स्त्र्युवाच त्वं वेत्स्यसे मामिह यास्मि शक्र यदर्थं चाहं रोदिमि मन्दभाग्या । आगच्छ राजन् पुरतो गमिष्ये द्रष्टासि तद् रोदिमि यत्कृतेऽहम् ॥ १३ ॥

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