महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1377, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंव्यासजीने कहा— राजन्! (अपनी पुत्रीके एक और जन्मका वृत्तान्त भी सुनो—) एक तपोवनमें किसी महात्मा मुनिकी कोई कन्या रहती थी। सती-साध्वी एवं रूपवती होनेपर भी उसे योग्य पतिकी प्राप्ति नहीं हुई॥ ४४॥
तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम्।
तामुवाचेश्वरः प्रीतो वृणु काममिति स्वयं॥ ४५ ॥
उसने कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया; महादेवजी प्रसन्न हो साक्षात् प्रकट होकर उस मुनि-कन्यासे बोले—'तुम मनोवांछित वर माँगो'॥ ४५॥
सैवमुक्ताब्रवीत् कन्या देवं वरदमीश्वरम्।
पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः॥ ४६ ॥
उनके यों कहनेपर उस मुनि-कन्याने वरदायक महेश्वरसे बार-बार कहा—'मैं सर्वगुणसम्पन्न पति चाहती हूँ'॥ ४६॥
ददौ तस्यै स देवेशस्तं वरं प्रीतमानसः।
पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति शंकरः॥ ४७ ॥
देवेश्वर भगवान् शंकर प्रसन्नचित्त होकर उसे वर देते हुए बोले—'भद्रे! तुम्हारे पाँच पति होंगे'॥ ४७॥
सा प्रसादयती देवमिदं भूयोऽभ्यभाषत।
एकं पतिं गुणोपेतं त्वत्तोऽर्हामीति शंकर॥ ४८ ॥
यह सुनकर उसने महादेवजीको प्रसन्न करते हुए पुनः यह बात कही—'शंकरजी! मैं तो आपसे एक ही गुणवान् पति प्राप्त करना चाहती हूँ'॥ ४८॥
तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः।
पञ्चकृत्वस्त्वयोक्तोऽहं पतिं देहीति वै पुनः॥ ४९ ॥
तत् तथा भविता भद्रे वचस्तद् भद्रमस्तु ते।
देहमन्यं गतायास्ते सर्वमेतद् भविष्यति॥ ५० ॥
तब देवाधिदेव महादेवजीने मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट होकर उससे यह शुभ वचन कहा—'भद्रे! तुमने 'पति दीजिये' इस वाक्यको पाँच बार दुहराया है; इसलिये मैंने जो पहले कहा है, वैसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो। किंतु तुम्हें दूसरे शरीरमें प्रवेश करनेपर यह सब होगा'॥ ४९-५०॥
द्रुपदैषा हि सा जज्ञे सुता वै देवरूपिणी।
पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता॥ ५१ ॥
द्रुपद! वही मुनिकन्या तुम्हारी इस दिव्यरूपिणी पुत्रीके रूपमें फिर उत्पन्न हुई है। अतः यह पृषत-वंशकी सती कन्या कृष्णा पहलेसे ही पाँच पतियोंकी पत्नी नियत की गयी है॥ ५१॥
स्वर्गश्रीः पाण्डवार्थं तु समुत्पन्ना महामखे।