महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1376, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंमाल्यैश्चाग्र्यैः शोभमानानतीव । साक्षात् त्र्यक्षान् वा वसूंश्चापि रुद्रा- नादित्यान् वा सर्वगुणोपपन्नान् ॥ ४० ॥ वे दिव्य निर्मल वस्त्रों, उत्तम गन्धों और सुन्दर मालाओंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे तथा साक्षात् त्रिनेत्र महादेव, वसुगण, रुद्रगण अथवा आदित्यगणोंके समान तेजस्वी एवं सर्वगुणसम्पन्न दिखायी देते थे ॥ ४० ॥
तान् पूर्वेन्द्रानभिवीक्ष्याभिरूपान् शक्रात्मजं चेन्द्ररूपं निशम्य । प्रीतो राजा द्रुपदो विस्मितश्च दिव्यां मायां तामवेक्ष्याप्रमेयाम् ॥ ४१ ॥ चारों पाण्डवोंको परम सुन्दर पूर्वकालिक इन्द्रोंके रूपमें तथा इन्द्रपुत्र अर्जुनको भी इन्द्रके ही स्वरूपमें देखकर उस अप्रमेय दिव्य मायापर दृष्टिपात करके राजा द्रुपद अत्यन्त प्रसन्न एवं आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ४१ ॥
तां चैवाग्र्यां स्त्रियमतिरूपयुक्तां दिव्यां साक्षात् सोमवह्निप्रकाशाम् । योग्यां तेषां रूपतेजोयशोभिः पत्नीं मत्वा हृष्टवान् पार्थिवेन्द्रः ॥ ४२ ॥ उन राजराजेश्वरने अपनी पुत्रीको भी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी, अत्यन्त रूपवती और साक्षात् चन्द्रमा तथा अग्निके समान प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारीके रूपमें देखा। साथ ही यह मान लिया कि द्रौपदी रूप, तेज और यशकी दृष्टिसे अवश्य उन पाण्डवोंकी पत्नी होनेयोग्य है। इससे उन्हें महान् हर्ष हुआ ॥ ४२ ॥
स तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य । नैतच्चित्रं परमर्षे त्वयीति प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ॥ ४३ ॥ यह महान् आश्चर्य देखकर द्रुपदने सत्यवतीनन्दन व्यासजीके चरण पकड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उनसे कहा—'महर्षे! आपमें ऐसी अद्भुत शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है।' तब व्यासजी प्रसन्नचित्त हो द्रुपदसे बोले ॥ ४३ ॥
व्यास उवाच
आसीत् तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः । नाध्यगच्छत् पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ४४ ॥