भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

माल्यैश्चाग्र्यैः शोभमानानतीव । साक्षात् त्र्यक्षान् वा वसूंश्चापि रुद्रा- नादित्यान् वा सर्वगुणोपपन्नान् ॥ ४० ॥ वे दिव्य निर्मल वस्त्रों, उत्तम गन्धों और सुन्दर मालाओंसे अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे तथा साक्षात् त्रिनेत्र महादेव, वसुगण, रुद्रगण अथवा आदित्यगणोंके समान तेजस्वी एवं सर्वगुणसम्पन्न दिखायी देते थे ॥ ४० ॥

तान् पूर्वेन्द्रानभिवीक्ष्याभिरूपान् शक्रात्मजं चेन्द्ररूपं निशम्य । प्रीतो राजा द्रुपदो विस्मितश्च दिव्यां मायां तामवेक्ष्याप्रमेयाम् ॥ ४१ ॥ चारों पाण्डवोंको परम सुन्दर पूर्वकालिक इन्द्रोंके रूपमें तथा इन्द्रपुत्र अर्जुनको भी इन्द्रके ही स्वरूपमें देखकर उस अप्रमेय दिव्य मायापर दृष्टिपात करके राजा द्रुपद अत्यन्त प्रसन्न एवं आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ४१ ॥

तां चैवाग्र्यां स्त्रियमतिरूपयुक्तां दिव्यां साक्षात् सोमवह्निप्रकाशाम् । योग्यां तेषां रूपतेजोयशोभिः पत्नीं मत्वा हृष्टवान् पार्थिवेन्द्रः ॥ ४२ ॥ उन राजराजेश्वरने अपनी पुत्रीको भी सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी, अत्यन्त रूपवती और साक्षात् चन्द्रमा तथा अग्निके समान प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारीके रूपमें देखा। साथ ही यह मान लिया कि द्रौपदी रूप, तेज और यशकी दृष्टिसे अवश्य उन पाण्डवोंकी पत्नी होनेयोग्य है। इससे उन्हें महान् हर्ष हुआ ॥ ४२ ॥

स तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यरूपं जग्राह पादौ सत्यवत्याः सुतस्य । नैतच्चित्रं परमर्षे त्वयीति प्रसन्नचेताः स उवाच चैनम् ॥ ४३ ॥ यह महान् आश्चर्य देखकर द्रुपदने सत्यवतीनन्दन व्यासजीके चरण पकड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उनसे कहा—'महर्षे! आपमें ऐसी अद्भुत शक्तिका होना आश्चर्यकी बात नहीं है।' तब व्यासजी प्रसन्नचित्त हो द्रुपदसे बोले ॥ ४३ ॥

व्यास उवाच

आसीत् तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः । नाध्यगच्छत् पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ४४ ॥

व्यासजीने कहा— राजन्! (अपनी पुत्रीके एक और जन्मका वृत्तान्त भी सुनो—) एक तपोवनमें किसी महात्मा मुनिकी कोई कन्या रहती थी। सती-साध्वी एवं रूपवती होनेपर भी उसे योग्य पतिकी प्राप्ति नहीं हुई॥ ४४॥
तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम्।
तामुवाचेश्वरः प्रीतो वृणु काममिति स्वयं॥ ४५ ॥
उसने कठोर तपस्याद्वारा भगवान् शंकरको संतुष्ट किया; महादेवजी प्रसन्न हो साक्षात् प्रकट होकर उस मुनि-कन्यासे बोले—'तुम मनोवांछित वर माँगो'॥ ४५॥
सैवमुक्ताब्रवीत् कन्या देवं वरदमीश्वरम्।
पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः॥ ४६ ॥
उनके यों कहनेपर उस मुनि-कन्याने वरदायक महेश्वरसे बार-बार कहा—'मैं सर्वगुणसम्पन्न पति चाहती हूँ'॥ ४६॥
ददौ तस्यै स देवेशस्तं वरं प्रीतमानसः।
पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति शंकरः॥ ४७ ॥
देवेश्वर भगवान् शंकर प्रसन्नचित्त होकर उसे वर देते हुए बोले—'भद्रे! तुम्हारे पाँच पति होंगे'॥ ४७॥
सा प्रसादयती देवमिदं भूयोऽभ्यभाषत।
एकं पतिं गुणोपेतं त्वत्तोऽर्हामीति शंकर॥ ४८ ॥
यह सुनकर उसने महादेवजीको प्रसन्न करते हुए पुनः यह बात कही—'शंकरजी! मैं तो आपसे एक ही गुणवान् पति प्राप्त करना चाहती हूँ'॥ ४८॥
तां देवदेवः प्रीतात्मा पुनः प्राह शुभं वचः।
पञ्चकृत्वस्त्वयोक्तोऽहं पतिं देहीति वै पुनः॥ ४९ ॥
तत् तथा भविता भद्रे वचस्तद् भद्रमस्तु ते।
देहमन्यं गतायास्ते सर्वमेतद् भविष्यति॥ ५० ॥
तब देवाधिदेव महादेवजीने मन-ही-मन अत्यन्त संतुष्ट होकर उससे यह शुभ वचन कहा—'भद्रे! तुमने 'पति दीजिये' इस वाक्यको पाँच बार दुहराया है; इसलिये मैंने जो पहले कहा है, वैसा ही होगा, तुम्हारा कल्याण हो। किंतु तुम्हें दूसरे शरीरमें प्रवेश करनेपर यह सब होगा'॥ ४९-५०॥
द्रुपदैषा हि सा जज्ञे सुता वै देवरूपिणी।
पञ्चानां विहिता पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता॥ ५१ ॥
द्रुपद! वही मुनिकन्या तुम्हारी इस दिव्यरूपिणी पुत्रीके रूपमें फिर उत्पन्न हुई है। अतः यह पृषत-वंशकी सती कन्या कृष्णा पहलेसे ही पाँच पतियोंकी पत्नी नियत की गयी है॥ ५१॥
स्वर्गश्रीः पाण्डवार्थं तु समुत्पन्ना महामखे।

सेह तप्त्वा तपो घोरं दुहितृत्वं तवागता ॥ ५२ ॥
यह स्वर्गलोककी लक्ष्मी है, जो पाण्डवोंके लिये तुम्हारे महायज्ञमें प्रकट हुई है। इसने अत्यन्त घोर तपस्या करके इस जन्ममें तुम्हारी पुत्री होनेका सौभाग्य प्राप्त किया है ॥ ५२ ॥
सैषा देवी रुचिरा देवजुष्टा
पञ्चानामेका स्वकृतेनेह कर्मणा ।
सृष्टा स्वयं देवपत्नी स्वयम्भुवा
श्रुत्वा राजन् द्रुपदेष्टं कुरुष्व ॥ ५३ ॥
महाराज द्रुपद! वही यह देवसेवित सुन्दरी देवी अपने ही कर्मसे पाँच पुरुषोंकी एक ही पत्नी नियत की गयी है। स्वयं ब्रह्माजीने इसे देवस्वरूप पाण्डवोंकी पत्नी होनेके लिये रचा है। यह सब सुनकर तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो ॥ ५३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पञ्चेन्द्रोपाख्याने
षण्णवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पाँच इन्द्रोंके उपाख्यानका वर्णन करनेवाला एक सौ छानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९६ ॥


* भगवान् नारायण सच्चिदानन्दघन हैं; उनके नाम, रूप, लीला और धाम—सभी चिन्मय हैं। उन्होंने अपने श्याम और श्वेत केशोंको द्वारमात्र बनाकर स्वयं ही सम्पूर्णरूपसे अपनेको प्रकट किया था।

१९७-

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

द्रौपदीका पाँचों पाण्डवोंके साथ विवाह

द्रुपद उवाच

अश्रुत्वैवं वचनं ते महर्षे
मया पूर्वं यतितं संविधातुम् ।
न वै शक्यं विहितस्यापयानां
तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥ १ ॥

द्रुपद बोले—‘ब्रह्मर्षे! आपके इस वचनको न सुननेके कारण ही पहले मैंने वैसा करने (कृष्णाको एक ही योग्य पतिसे ब्याहने)-का प्रयत्न किया था; परंतु विधाताने जो रच रखा है, उसे टाल देना असम्भव है; अतः उसी पूर्वनिर्धारित विधानका पालन करना उचित है ॥ १ ॥

दिष्टस्य ग्रन्थिरनिवर्तनीयः
स्वकर्मणा विहितं नेह किंचित् ।
कृतं निमित्तं हि वरैकहेतो-
स्तदेवेदमुपपन्नं विधानम् ॥ २ ॥

भाग्यमें जो लिख दिया है, उसे कोई भी बदल नहीं सकता। अपने प्रयत्नसे यहाँ कुछ नहीं हो सकता। एक वरकी प्राप्तिके लिये जो साधन (तप) किया गया, वही पाँच पतियोंकी प्राप्तिका कारण बन गया; अतः दैवके द्वारा पूर्वनिर्धारित विधानका ही पालन करना उचित है ॥ २ ॥

यथैव कृष्णोक्तवती पुरस्ता-
न्नैकं पतिं मे भगवान् ददातु ।
स चाप्येवं वरमित्यब्रवीत् तां
देवो हि वेत्ता परमं यदत्र ॥ ३ ॥

पूर्वजन्ममें कृष्णाने अनेक बार भगवान् शंकरसे कहा—‘प्रभो! मुझे पति दें।’ जैसा उसने कहा, वैसा ही वर उन्होंने भी उसे दे दिया। अतः इसमें कौन-सा उत्तम रहस्य छिपा है, उसे वे भगवान् ही जानते हैं ॥ ३ ॥

यदि चैवं विहितः शंकरेण
धर्मोऽधर्मो वा नात्र ममापराधः ।
गृह्णन्त्विमे विधिवत् पाणिमस्या
यथोपजोषं विहितैषां हि कृष्णा ॥ ४ ॥

यदि साक्षात् शंकरने ऐसा विधान किया है तो यह धर्म हो या अधर्म, इसमें मेरा कोई अपराध नहीं है। ये पाण्डवलोग विधिपूर्वक प्रसन्नतासे इसका पाणिग्रहण करें; विधाताने ही कृष्णाको इन पाण्डवोंकी पत्नी बनाया है ।। ४ ।।

वैशम्पायन उवाच

ततोऽब्रवीद् भगवान् धर्मराज- मद्यैव पुण्याहमृत वः पाण्डवेय । अद्य पौष्यं योगमुपैति चन्द्रमाः पाणिं कृष्णायास्त्वं गृहाणाद्य पूर्वम् ।। ५ ।। वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर भगवान् व्यासने धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा—'पाण्डुनन्दन! आज ही तुम लोगोंके लिये पुण्य-दिवस है। आज चन्द्रमा भरण-पोषणकारक पुष्य नक्षत्रपर जा रहे हैं; इसलिये आज पहले तुम्हीं कृष्णाका पाणिग्रहण करो' ।। ५ ।।

ततो राजा यज्ञसेनः सपुत्रो जन्यार्थमुक्तं बहु तत् तदग्र्यम् । समानयामास सुतां च कृष्णा- माप्लाव्य रत्नैर्बहुभिर्विभूष्य ।। ६ ।। व्यासजीका यह आदेश सुनकर पुत्रोंसहित राजा द्रुपदने वर-वधूके लिये कथित समस्त उत्तम वस्तुओंको मँगवाया और अपनी पुत्री कृष्णाको स्नान कराकर बहुत-से रत्नमय आभूषणोंद्वारा विभूषित किया ।। ६ ।।

ततस्तु सर्वे सुहृदो नृपस्य समाजग्मुः सहिता मन्त्रिणश्च । द्रष्टुं विवाहं परमप्रतीता द्विजाश्च पौराश्च यथा प्रधानाः ।। ७ ।। तत्पश्चात् राजाके सभी सुहृद्-सम्बन्धी, मन्त्री, ब्राह्मण और पुरवासी अत्यन्त प्रसन्न हो विवाह देखनेके लिये आये और बड़ोंको आगे करके बैठे ।। ७ ।।

ततोऽस्य वेश्माग्र्यजनोपशोभितं विस्तीर्णपद्मोत्पलभूषिताजिरम् । बलौघरत्नौघविचित्रमाबभौ नभो यथा निर्मलतारकान्वितम् ।। ८ ।। तदनन्तर राजा द्रुपदका वह भवन श्रेष्ठ पुरुषोंसे सुशोभित होने लगा। उसके आँगनको विस्तृत कमल और उत्पल आदिसे सजाया गया था। वहाँ एक ओर सेनाएँ खड़ी थीं और

दूसरी ओर रत्नोंका ढेर लगा था। इससे वह राजभवन निर्मल तारकाओंसे संयुक्त आकाशकी भाँति विचित्र शोभा धारण कर रहा था ।। ८ ।।

ततस्तु ते कौरवराजपुत्रा विभूषिताः कुण्डलिनो युवानः। महार्हवस्त्राम्बरचन्दनोक्षिताः कृताभिषेकाः कृतमङ्गलक्रियाः ।। ९ ।।

इधर युवावस्थासे सम्पन्न कौरव-राजकुमार पाण्डव वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और कुण्डलोंसे अलंकृत हो अभिषेक और मंगलाचार करके बहुमूल्य कपड़ों एवं केसर, चन्दनसे सुशोभित हुए ।। ९ ।।

पुरोहितेनाग्निसमानवर्चसा सहैव धौम्येन यथाविधि प्रभो। क्रमेण सर्वे विविशुस्ततः सदो महर्षभा गोष्ठमिवाभिनन्दिनः ।। १० ।।

तब अग्निके समान तेजस्वी अपने पुरोहित धौम्यजीके साथ विधिपूर्वक बड़े-छोटेके क्रमसे वे सभी प्रसन्नतापूर्वक विवाहमण्डपमें गये—ठीक उसी तरह, जैसे बड़े-बड़े साँड गोशालामें प्रवेश करें ।। १० ।।

ततः समाधाय स वेदपारगो जुहाव मन्त्रैर्ज्वलितं हुताशनम्। युधिष्ठिरं चाप्युपनीय मन्त्रवि- न्नियोजयामास सहैव कृष्णया ।। ११ ।।

तत्पश्चात् वेदके पारंगत विद्वान् मन्त्रज्ञ पुरोहित धौम्यने (वेदीपर) प्रज्वलित अग्निकी स्थापना करके उसमें मन्त्रोंद्वारा आहुति दी और युधिष्ठिरको बुलाकर कृष्णाके साथ उनका गठबन्धन कर दिया ।। ११ ।।

प्रदक्षिणं तौ प्रगृहीतपाणी समानयामास स वेदपारगः। ततोऽभ्यनुज्ञाय तमाजिशोभिनं पुरोहितो राजगृहाद् विनिर्ययौ ।। १२ ।।

वेदोंके परिपूर्ण विद्वान् पुरोहितने उन दोनों दम्पतिका पाणिग्रहण कराकर उनसे अग्निकी परिक्रमा करवायी, फिर (अन्य शास्त्रोक्त विधियोंका अनुष्ठान करके) उनका विवाहकार्य सम्पन्न कर दिया। इसके बाद संग्राममें शोभा पानेवाले युधिष्ठिरको छुट्टी देकर पुरोहितजी भी उस राजभवनसे बाहर चले गये ।। १२ ।।

क्रमेण चानेन नराधिपात्मजा वरस्त्रियस्ते जगृहुस्तदा करम्।

अहन्यहन्युत्तमरूपधारिणो महारथाः कौरववंशवर्धनाः ॥ १३ ॥ इसी क्रमसे कौरव-कुलकी वृद्धि करनेवाले, उत्तम शोभा धारण करनेवाले महारथी राजकुमार पाण्डवोंने एक-एक दिन परम सुन्दरी द्रौपदीका पाणिग्रहण किया ॥ १३ ॥ इदं च तत्राद्भुतरूपमुत्तमं जगाद देवर्षिरतीतमानुषम् । महानुभावा किल सा सुमध्यमा बभूव कन्यैव गते गतेऽहनि ॥ १४ ॥ देवर्षिने वहाँ घटित हुई इस अद्भुत, उत्तम एवं अलौकिक घटनाका वर्णन किया है कि सुन्दर कटिप्रदेशवाली महानुभावा द्रौपदी प्रतिवार विवाहके दूसरे दिन कन्याभावको ही प्राप्त हो जाती थी ॥ १४ ॥ कृते विवाहे द्रुपदो धनं ददौ महारथेभ्यो बहुरूपमुत्तमम् । शतं रथानां वरहेममालिनां चतुर्युजां हेमखलीनमालिनाम् ॥ १५ ॥ विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर द्रुपदने महारथी पाण्डवोंको दहेजमें बहुत-सा धन और नाना प्रकारकी उत्तम वस्तुएँ समर्पित कीं। सुन्दर सुवर्णकी मालाओं और सुवर्णजटित जुओंसे सुशोभित सौ रथ प्रदान किये, जिनमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे ॥ १५ ॥ शतं गजानामपि पद्मिनां तथा शतं गिरीणामिव हेमशृङ्गिणाम् । तथैव दासीशतमग्रयौवनं महार्हवेषाभरणाम्बरस्रजम् ॥ १६ ॥ पद्म आदि उत्तम लक्षणोंसे युक्त सौ हाथी तथा पर्वतोंके समान ऊँचे और सुनहरे हौदोंसे सुशोभित सौ हाथी और (साथ ही) बहुमूल्य शृंगार-सामग्री, वस्त्राभूषण एवं हार धारण करनेवाली एक सौ नवयौवना दासियाँ भी भेंट कीं ॥ १६ ॥ पृथक् पृथग् दिव्यदृशां पुनर्ददौ तदा धनं सौमकिरग्निसाक्षिकम् । तथैव वस्त्राणि विभूषणानि प्रभावयुक्तानि महानुभावः ॥ १७ ॥ सोमकवंशमें उत्पन्न महानुभाव राजा द्रुपदने इस प्रकार अग्निको साक्षी बनाकर प्रत्येक सुन्दर दृष्टिवाले पाण्डवोंके लिये अलग-अलग प्रचुर धन तथा प्रभुत्व-सूचक बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण अर्पित किये ॥ १७ ॥ कृते विवाहे च ततस्तु पाण्डवाः

प्रभूतरत्नामुपलभ्य तां श्रियम् ।
विजहुरिन्द्रप्रतिमा महाबलाः
पुरे तु पाञ्चालनृपस्य तस्य ह ॥ १८ ॥

विवाहके पश्चात् इन्द्रके समान महाबली पाण्डव प्रचुर रत्नराशिके साथ लक्ष्मीस्वरूपा द्रौपदीको पाकर पांचालराज द्रुपदके ही नगरमें सुखपूर्वक विहार करने लगे ॥ १८ ॥

(सर्वेऽप्यतुष्यन् नृप पाण्डवेया-
स्तस्याः शुभैः शीलसमाधिवृत्तैः ।
सा चाप्येषा याज्ञसेनी तदानीं
विवर्धयामास मुदं स्वसुव्रतैः ॥)

राजन्! सभी पाण्डव द्रौपदीकी सुशीलता, एकाग्रता और सद्व्यवहारसे बहुत संतुष्ट थे (और द्रौपदीको भी संतुष्ट रखनेका प्रयत्न करते थे)। इसी प्रकार द्रुपदकुमारी कृष्णा भी उस समय अपने उत्तम नियमोंद्वारा पाण्डवोंका आनन्द बढ़ाती थी।

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्रौपदीविवाहे
सप्तनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें द्रौपदीविवाहविषयक एक सौ सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १९ श्लोक हैं)

१९८-

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

कुन्तीका द्रौपदीको उपदेश और आशीर्वाद तथा भगवान् श्रीकृष्णका पाण्डवोंके लिये उपहार भेजना

वैशम्पायन उवाच

पाण्डवैः सह संयोगं गतस्य द्रुपदस्य ह ।
न बभूव भयं किंचिद् देवेभ्योऽपि कथंचन ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंसे सम्बन्ध हो जानेपर राजा द्रुपदको देवताओंसे भी किसी प्रकारका कुछ भी भय नहीं रहा, फिर मनुष्योंसे तो हो ही कैसे सकता था ॥ १ ॥

कुन्तीमासाद्य ता नार्यो द्रुपदस्य महात्मनः ।
नाम संकीर्तयन्त्योऽस्या जग्मुः पादौ स्वमूर्धभिः ॥ २ ॥
महात्मा द्रुपदके कुटुम्बकी स्त्रियाँ कुन्तीके पास आकर अपने नाम ले-लेकर उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करने लगीं ॥ २ ॥

कृष्णा च क्षौमसंवीता कृतकौतुकमङ्गला ।
कृताभिवादना श्वश्र्वास्तस्थौ प्रह्वा कृताञ्जलिः ॥ ३ ॥
कृष्णा भी रेशमी साड़ी पहने मांगलिक कार्य सम्पन्न करनेके पश्चात् सासके चरणोंमें प्रणाम करके उनके सामने हाथ जोड़ विनीतभावसे खड़ी हुई ॥ ३ ॥

रूपलक्षणसम्पन्नां शीलाचारसमन्विताम् ।
द्रौपदीमवदत् प्रेम्णा पृथाऽऽशीर्वचनं स्नुषाम् ॥ ४ ॥
सुन्दर रूप तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, शील और सदाचारसे सुशोभित अपनी बहू द्रौपदीको सामने देख कुन्तीदेवी उसे प्रेमपूर्वक आशीर्वाद देती हुई बोलीं— ॥ ४ ॥

यथेन्द्राणी हरिहये स्वाहा चैव विभावसौ ।
रोहिणी च यथा सोमे दमयन्ती यथा नले ॥ ५ ॥
यथा वैश्रवणे भद्रा वसिष्ठे चाप्यरुन्धती ।
यथा नारायणे लक्ष्मीस्तथा त्वं भव भर्तृषु ॥ ६ ॥
‘बेटी! जैसे इन्द्राणी इन्द्रमें, स्वाहा अग्निमें, रोहिणी चन्द्रमामें, दमयन्ती नलमें, भद्रा कुबेरमें, अरुन्धती वसिष्ठमें तथा लक्ष्मी भगवान् नारायणमें भक्ति-भाव एवं प्रेम रखती हैं, उसी प्रकार तुम भी अपने पतियोंमें अनुरक्त रहो ॥ ५-६ ॥

जीवसूर्वीरसूर्भद्रे बहुसौख्यसमन्विता । सुभगा भोगसम्पन्ना यज्ञपत्नी पतिव्रता ॥ ७ ॥ ‘भद्रे! तुम अनन्त सौख्यसे सम्पन्न होकर दीर्घजीवी तथा वीर पुत्रोंकी जननी बनो। सौभाग्यशालिनी, भोगसामग्रीसे सम्पन्न, पतिके साथ यज्ञमें बैठनेवाली तथा पतिव्रता होओ ॥ ७ ॥

अतिथीनागतान् साधून् वृद्धान् बालांस्तथा गुरून् । पूजयन्त्या यथान्यायं शश्वद् गच्छन्तु ते समाः ॥ ८ ॥ ‘अपने घरपर आये हुए अतिथियों, साधु पुरुषों, बड़े-बूढ़ों, बालकों तथा गुरुजनोंका यथायोग्य सत्कार करनेमें ही तुम्हारा प्रत्येक वर्ष बीते ॥ ८ ॥

कुरुजाङ्गलमुख्येषु राष्ट्रेषु नगरेषु च । अनु त्वमभिषिच्यस्व नृपतिं धर्मवत्सला ॥ ९ ॥ ‘तुम्हारे पति कुरुजांगल देशके प्रधान-प्रधान राष्ट्रों तथा नगरोंके राजा हों और उनके साथ ही रानीके पदपर तुम्हारा अभिषेक हो। धर्मके प्रति तुम्हारे हृदयमें स्वाभाविक स्नेह हो ॥ ९ ॥

पतिभिर्निर्जितामुर्वीं विक्रमेण महाबलैः । कुरु ब्राह्मणसात् सर्वामश्वमेधे महाक्रतौ ॥ १० ॥ ‘तुम्हारे महाबली पतियोंद्वारा पराक्रमसे जीती हुई इस समूची पृथ्वीको तुम अश्वमेध नामक महायज्ञमें ब्राह्मणोंके हवाले कर दो ॥ १० ॥

पृथिव्यां यानि रत्नानि गुणवन्ति गुणान्विते ।
तान्याप्नुहि त्वं कल्याणि सुखिनी शरदां शतम् ॥ ११ ॥
'कल्याणमयी गुणवती बहू! पृथ्वीपर जितने गुणवान् रत्न हैं, वे सब तुम्हें प्राप्त हों और तुम सौ वर्षतक सुखी रहो ॥ ११ ॥
यथा च त्वाभिनन्दामि वध्वद्य क्षौमसंवृताम् ।
तथा भूयोऽभिनन्दिष्ये जातपुत्रां गुणान्विताम् ॥ १२ ॥
'बहू! आज तुम्हें वैवाहिक रेशमी वस्त्रोंसे सुशोभित देखकर जिस प्रकार मैं तुम्हारा अभिनन्दन करती हूँ, उसी प्रकार जब तुम पुत्रवती होओगी, उस समय भी अभिनन्दन करूँगी; तुम सद्गुणसम्पन्न हो' ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच
ततस्तु कृतदारेभ्यः पाण्डुभ्यः प्राहिणोद्धरिः ।
वैदूर्यमणिचित्राणि हैमान्याभरणानि च ॥ १३ ॥
वासांसि च महार्हाणि नानादेश्यानि माधवः ।
कम्बलाजिनरत्नानि स्पर्शवन्ति शुभानि च ॥ १४ ॥
शयनासनयानानि विविधानि महान्ति च ।
वैदूर्यवज्रचित्राणि शतशो भाजनानि च ॥ १५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर विवाह हो जानेपर पाण्डवोंके लिये भगवान् श्रीकृष्णने वैदूर्यमणि-जटित सोनेके बहुत-से आभूषण, बहुमूल्य वस्त्र, अनेक देशोंके बने हुए कोमल स्पर्शवाले कम्बल, मृगचर्म, सुन्दर रत्न, शय्याएँ, आसन, भाँति-भाँतिके बड़े-बड़े वाहन तथा वैदूर्य और वज्रमणि (हीरे)-से खचित सैकड़ों बर्तन भेंटके तौरपर भेजे ॥ १३—१५ ॥
रूपयौवनदाक्षिण्यैरुपेताश्च स्वलंकृताः ।
प्रेष्याः सम्प्रददौ कृष्णो नानादेश्याः स्वलंकृताः ॥ १६ ॥
रूप-यौवन और चातुर्य आदि गुणोंसे सम्पन्न तथा वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत अनेक देशोंकी सजी-धजी बहुत सी सुन्दरी सेविकाएँ भी समर्पित कीं ॥ १६ ॥
गजान् विनीतान् भद्रांश्च सदश्वांश्च स्वलंकृतान् ।
रथांश्च दान्तान् सौवर्णैः शुभ्रैः पट्टैरलंकृतान् ॥ १७ ॥
कोटिशश्च सुवर्णं च तेषामकृतकं तथा ।
वीथीकृतममेयात्मा प्राहिणोन्मधुसूदनः ॥ १८ ॥
इसके सिवा अमेयात्मा मधुसूदनने सुशिक्षित और वशमें रहनेवाले अच्छी जातिके हाथी, गहनोंसे सजे हुए उत्तम घोड़े, चमकते हुए सोनेके पत्रोंसे सुशोभित और सधे हुए

घोड़ोंसे युक्त बहुत-से सुन्दर रथ, करोड़ों स्वर्णमुद्राएँ तथा पंक्तिमें रखी हुई सुवर्णकी ढेरियाँ उनके लिये भेजीं॥ १७-१८॥

तत् सर्वं प्रतिजग्राह धर्मराजो युधिष्ठिरः।
मुदा परमया युक्तो गोविन्दप्रियकाम्यया ॥ १९॥
धर्मराज युधिष्ठिरने अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान् श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये वह सारा उपहार ग्रहण कर लिया॥ १९॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि अष्टनवत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १९८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें एक सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १९८॥

(विदुरागमनराज्यलम्भपर्व)

⬅ विषय-सूची (TOC)

(विदुरागमनराज्यलम्भपर्व)

नवनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवोंके विवाहसे दुर्योधन आदिकी चिन्ता, धृतराष्ट्रका पाण्डवोंके प्रति प्रेमका दिखावा और दुर्योधनकी कुमन्त्रणा

वैशम्पायन उवाच

ततो राज्ञां चरैराप्तैः प्रवृत्तिरुपनीयत ।
पाण्डवैरुपसम्पन्ना द्रौपदी पतिभिः शुभा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर सब राजाओंको अपने विश्वसनीय गुप्तचरोंद्वारा यह यथार्थ समाचार मिल गया कि शुभलक्षणा द्रौपदीका विवाह पाँचों पाण्डवोंके साथ हुआ है ॥ १ ॥
येन तद् धनुरादाय लक्ष्यं विद्धं महात्मना ।
सोऽर्जुनो जयतां श्रेष्ठो महाबाणधनुर्धरः ॥ २ ॥
जिन महात्मा पुरुषने वह धनुष लेकर लक्ष्यको वेधा था, वे विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ तथा महान् धनुष-बाण धारण करनेवाले स्वयं अर्जुन थे ॥ २ ॥
यः शल्यं मद्रराजं वै प्रोत्क्षिप्यापातयद् बली ।
त्रासयामास संक्रुद्धो वृक्षेण पुरुषान् रणे ॥ ३ ॥
न चास्य सम्भ्रमः कश्चिदासीत् तत्र महात्मनः ।
स भीमो भीमसंस्पर्शः शत्रुसेनाङ्गपातनः ॥ ४ ॥
जिस बलवान् वीरने अत्यन्त कुपित हो मद्रराज शल्यको उठाकर पृथ्वीपर पटक दिया था और हाथमें वृक्ष ले रणभूमिमें समस्त योद्धाओंको भयभीत कर डाला था तथा जिस महातेजस्वी शूरवीरको उस समय तनिक भी घबराहट नहीं हुई थी, वह शत्रुसेनाके हाथी, घोड़े आदि अंगोंको मार गिरानेवाला तथा स्पर्शमात्रसे भय उत्पन्न करनेवाला महाबली भीमसेन था ॥ ३-४ ॥
ब्रह्मरूपधराञ्छ्रुत्वा प्रशान्तान् पाण्डुनन्दनान् ।
कौन्तेयान् मनुजेन्द्राणां विस्मयः समजायत ॥ ५ ॥
ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रशान्तभावसे बैठे हुए वे वीर पुरुष कुन्तीपुत्र पाण्डव ही थे, यह सुनकर वहाँ आये हुए राजाओंको बड़ा आश्चर्य हुआ ॥ ५ ॥
सपुत्रा हि पुरा कुन्ती दग्धा जतुगृहे श्रुता ।

पुनर्जातानिव च तांस्तेऽमन्यन्त नराधिपाः ॥ ६ ॥ उन्होंने पहले सुन रखा था कि कुन्ती अपने पुत्रोंसहित लाक्षागृहमें जल गयी। अब उन्हें जीवित सुनकर वे राजालोग यह मानने लगे कि इन पाण्डवोंका फिर नया जन्म-सा हुआ है ॥ ६ ॥

धिगकुर्वंस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम् । कर्मणातिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै ॥ ७ ॥ पुरोचनके किये हुए अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मका स्मरण हो आनेसे उस समय सभी नरेश कुरुवंशी धृतराष्ट्र तथा भीष्मको धिक्कारने लगे ॥ ७ ॥

(धार्मिकान् वृत्तसम्पन्नान् मातुः प्रियहिते रतान् । यदा तानीदृशान् पार्थानुत्सादयितुमिच्छति ॥ ‘देखो न; धर्मात्मा, सदाचारी तथा माताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले कुन्तीकुमारोंको भी यह धृतराष्ट्र नष्ट करना चाहता है (भला, इससे बढ़कर निन्दनीय कौन होगा)।'

ततः स्वयंवरे वृत्ते धार्तराष्ट्राः स्म भारत । मन्त्रयन्ते ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिताः ॥ जनमेजय! उधर स्वयंवर समाप्त होनेपर धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जिन्हें कर्ण और शकुनिने बिगाड़ रखा था, इस प्रकार सलाह करने लगे।

शकुनिरुवाच

कश्चिच्छत्रुः कर्शनीयः पीडनीयस्तथापरः । उत्साद्नीयाः कौन्तेयाः सर्वे क्षत्रस्य मे मताः ॥ **शकुनि बोला—**संसारमें कोई शत्रु तो ऐसा होता है, जिसे सब प्रकारसे दुर्बल कर देना उचित है; दूसरा ऐसा होता है, जिसे सदा पीड़ा दी जाय। परंतु कुन्तीके ये सभी पुत्र तो समस्त क्षत्रियोंके लिये समूल नष्ट कर देनेयोग्य हैं। इनके विषयमें मेरा यही मत है।

एवं पराजिताः सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ । अकृत्वा संविदं कांचिद् तद् वस्तप्स्यत्यसंशयम् ॥ यदि इस प्रकार पराजित होकर आप सब लोग इन (पाण्डवोंके विनाशकी) युक्ति निश्चित किये बिना ही चले जायँगे, तो अवश्य ही यह भूल आपलोगोंको सदा संतप्त करती रहेगी।

अयं देशश्च कालश्च पाण्डवोद्धरणाय नः । न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ ॥ पाण्डवोंको जड़मूलसहित विनष्ट करनेके लिये हमारे सामने यही उपयुक्त देश और काल उपस्थित है। यदि आपलोग ऐसा नहीं करेंगे तो संसारमें उपहासके पात्र होंगे।

यमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम् । सोऽल्पवीर्यबलो राजा द्रुपदो वै मतो मम ॥ ये पाण्डव जिस राजाके आश्रयमें रहनेकी इच्छा रखते हैं, उस द्रुपदका बल और पराक्रम मेरी रायमें बहुत थोड़ा है।

यावदेतान् न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुङ्गवाः । चैद्यश्च पुरुषव्याघ्रः शिशुपालः प्रतापवान् ॥ जबतक वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर यह नहीं जानते कि पाण्डव जीवित हैं, पुरुषसिंह चेदिराज प्रतापी शिशुपाल भी जबतक इस बातसे अनभिज्ञ है, तभीतक पाण्डवोंको मार डालना चाहिये।

एकीभावं गता राज्ञा द्रुपदेन महात्मना । दुराधर्षतरा राजन् भविष्यन्ति न संशयः ॥ राजन्! जब ये महात्मा राजा द्रुपदके साथ मिलकर एक हो जायँगे, तब इन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन हो जायगा, इसमें संशय नहीं है।

यावदत्वरतां सर्वे प्राप्नुवन्ति नराधिपाः । तावदेव व्यवस्यामः पाण्डवानां वधं प्रति ॥ जबतक सब राजा ढीले पड़े हैं, तभीतक हमें पाण्डवोंके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर लेना चाहिये।

मुक्ता जतुगृहाद् भीमाद् आशीविषमुखादिव । पुनर्यदीह मुच्यन्ते महन्नो भयमाविशेत् ॥ विषधर सर्पके मुख-सदृश भयंकर लाक्षागृहसे तो वे बच ही गये हैं। यदि फिर यहाँ हमारे हाथसे छूट जाते हैं तो उनसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है।

तेषामिहोपयातानामेषां च पुरवासिनाम् । अन्तरे दुष्करं स्थातुं मेषयोर्महतोरिव ॥ यदि वे वृष्णिवंशी और चेदिवंशी वीर यहाँ आ जायँ और यहाँके नागरिक भी अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो जायँ तो इनके बीचमें खड़ा होना उतना ही कठिन होगा, जितना आपसमें लड़ते हुए दो विशाल मेढ़ोंके बीचमें ठहरना।

हलधृक्प्रगृहीतानि बलानि बलिनां स्वयं । यावन्न कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ॥ तावत् सर्वाभिसारेण पुरमेतद् विनाशयताम् । एतदत्र परं मन्ये प्राप्तकालं नरर्षभाः ॥ जबतक हल धारण करनेवाले बलरामजीके द्वारा संचालित बलवान् योद्धाओंकी सेनाएँ स्वयं ही आकर कौरवसेनारूपी खेतीपर टिड्डियोंकी भाँति न टूट पड़ें, तबतक हम सब लोग

एक साथ आक्रमण करके इस नगरको नष्ट कर दें। नरश्रेष्ठ वीरो! मैं इस अवसरपर यही सर्वोत्तम कर्तव्य मानता हूँ!

वैशम्पायन उवाच

शकुनेर्वचनं श्रुत्वा भाषमाणस्य दुर्मतेः ।
सौमदत्तिरिदं वाक्यं जगाद परमं ततः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— दुर्बुद्धि शकुनिका यह प्रस्ताव सुनकर सोमदत्तकुमार भूरिश्रवाने यह उत्तम बात कही।

सौमदत्तिरुवाच

प्रकृतीः सप्त वै ज्ञात्वा आत्मनश्च परस्य च ।
तथा देशं च कालं च षड्विधांश्च नयेद् गुणान् ॥
भूरिश्रवा बोले— अपने पक्षकी और शत्रुपक्षकी भी सातों³ प्रकृतियोंको ठीक-ठीक जानकर ही देश और कालका ज्ञान रखते हुए छः³ प्रकारके गुणोंका यथावसर प्रयोग करना चाहिये।

स्थानं वृद्धिं क्षयं चैव भूमिं मित्राणि विक्रमम् ।
समीक्ष्याथाभियुञ्जीत परं व्यसनपीडितम् ॥
स्थान, वृद्धि, क्षय, भूमि, मित्र तथा पराक्रम—इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए यदि शत्रु संकटसे पीड़ित हो तभी उसपर आक्रमण करना चाहिये।

ततोऽहं पाण्डवान् मन्ये मित्रकोशसमन्वितान् ।
बलस्थान् विक्रमस्थांश्च स्वकृतैः प्रकृतिप्रियान् ॥
इस दृष्टिसे देखनेपर मैं पाण्डवोंको मित्र और खजाना दोनोंसे सम्पन्न समझता हूँ। वे बलवान् तो हैं ही, पराक्रमी भी हैं और अपने सत्कर्मोंद्वारा समस्त प्रजाके प्रिय हो रहे हैं।

वपुषा हि तु भूतानां नेत्राणि हृदयानि च ।
श्रोत्रं मधुरया वाचा रमयत्यर्जुनो नृणाम् ॥
अर्जुन अपने शरीरकी गठनसे (सभी) मनुष्योंके नेत्रों तथा हृदयको आनन्द प्रदान करते हैं और मीठी-मीठी वाणीद्वारा सबके कानोंको सुख पहुँचाते हैं।

न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन भेजिरे ।
यद् बभूव मनःकान्तं कर्मणा च चकार तत् ॥
केवल प्रारब्धसे ही प्रजा उनकी सेवा नहीं करती। प्रजाके मनको जो प्रिय लगता है, उसकी पूर्ति अर्जुन अपने प्रयत्नोंद्वारा करते रहते हैं।

न ह्ययुक्तं न चासक्तं नानृतं न च विप्रियम् ।
भाषितं चारुभाषस्य जज्ञे पार्थस्य भारती ॥

मनोहर वचन बोलनेवाले अर्जुनकी वाणी कभी ऐसा वचन नहीं बोलती, जो अयुक्त, आसक्तिपूर्ण, मिथ्या तथा अप्रिय हो।

तानेवंगुणसम्पन्नान् सम्पन्नान् राजलक्षणैः ।
न तान् पश्यामि ये शक्ताः समुच्छेत्तुं यथा बलात् ॥
समस्त पाण्डव राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न तथा उपर्युक्त गुणोंसे विभूषित हैं। मैं ऐसे किन्हीं वीरोंको नहीं देखता, जो अपने बलसे पाण्डवोंका वास्तवमें उच्छेद कर सकें।

प्रभावशक्तिर्विपुला मन्त्रशक्तिश्च पुष्कला ।
तथैवोत्साहशक्तिश्च पार्थेष्वभ्यधिका सदा ॥
उनकी प्रभावशक्ति विपुल है, मन्त्रशक्ति भी प्रचुर है तथा उत्साहशक्ति भी पाण्डवोंमें सबसे अधिक है।

मौलमित्रबलानां च कालज्ञो वै युधिष्ठिरः ।
साम्ना दानेन भेदेन दण्डेनेति युधिष्ठिरः ॥
अमित्रं यतते जेतुं न रोषेणेति मे मतिः ॥
युधिष्ठिर इस बातको अच्छी तरह जानते हैं कि कब स्वाभाविक बलका प्रयोग करना चाहिये तथा कब मित्र और सैन्यबलका। राजा युधिष्ठिर साम, दान, भेद और दण्डनीतिके द्वारा ही यथासमय शत्रुको जीतनेका प्रयत्न करते हैं, क्रोधके द्वारा नहीं—ऐसा मेरा विश्वास है।

परिक्रीय धनैः शत्रून् मित्राणि च बलानि च ।
मूलं च सुदृढं कृत्वा हन्त्यरीन् पाण्डवस्तदा ॥
पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर प्रचुर धन देकर शत्रुओंको, मित्रोंको तथा सेनाओंको भी खरीद लेते हैं और अपनी नींवको सुदृढ़ करके शत्रुओंका नाश करते हैं।

अशक्यान् पाण्डवान् मन्ये देवैरपि सवासवैः ।
येषामर्थे सदा युक्तौ कृष्णसंकर्षणावुभौ ॥
मैं ऐसा मानता हूँ कि इन्द्र आदि देवता भी उन पाण्डवोंका कुछ नहीं बिगाड़ सकते, जिनकी सहायताके लिये कृष्ण और बलराम दोनों सदा कमर कसे रहते हैं।

श्रेयश्च यदि मन्यध्वं मन्मतं यदि वो मतम् ।
संविदं पाण्डवैः सार्धं कृत्वा याम यथागतम् ॥
यदि आपलोग मेरी बातको हितकर मानते हों, यदि मेरे मतके अनुकूल ही आपलोगोंका मत हो, तो हमलोग पाण्डवोंसे मेल करके जैसे आये हैं, वैसे ही लौट चलें।

गोपुराट्टालकैरूच्चैरुपतल्पशतैरपि ।
गुप्तं पुरवरश्रेष्ठमेतद्विद्भिश्च संवृतम् ॥
तृणधान्येन्धनरसैस्तथा यन्त्रायुधौषधैः ।
युक्तं बहुकपाटैश्च द्रव्यागारतुषादिकैः ॥

यह श्रेष्ठ नगर गोपुरों, ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं तथा सैकड़ों उपतल्पोंसे सुरक्षित है। इसके चारों ओर जलसे भरी खाई है। घास-चारा, अनाज, ईंधन, रस, यन्त्र, आयुध तथा औषध आदिकी यहाँ बहुतायत है। बहुत-से कपाट, द्रव्यागार और भूसा आदिसे भी यह नगर भरपूर है। भीमोच्छ्रितमहाचक्रं बृहदट्टालसंवृतम् । दृढप्राकारनिर्यूहं शतघ्नीजालसंवृतम् ॥ यहाँ बड़े भयंकर और ऊँचे विशाल चक्र हैं। बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओंकी पंक्ति इस नगरको घेरे हुए है। इसकी चहारदीवारी और छज्जे सुदृढ़ हैं। शतघ्नी (तोप) नामक अस्त्रोंके समुदायसे यह नगरी घिरी हुई है। ऐष्टको दारवो वप्रो मानुषश्चेति यः स्मृतः । प्राकारकर्तृभिर्वीरैर्नृगर्भस्तत्र पूजितः ॥ इसकी रक्षाके लिये तीन प्रकारका घेरा बना है—एक तो ईंटोंका, दूसरा काठका और तीसरा मानव-सैनिकोंका। चहारदीवारी बनानेवाले वीरोंने यहाँ नगरगर्भकी पूजा की है। तदेतन्नरगर्भेण पाण्डरेण विराजते । सालेनानेकतालेन सर्वतः संवृतं पुरम् ॥ अनुरक्ताः प्रकृतयो द्रुपदस्य महात्मनः । दानमानार्चिताः सर्वे बाह्याश्चाभ्यन्तराश्च ये ॥ इस प्रकार यह नगर श्वेत नगरगर्भसे शोभित है। अनेक ताड़के बराबर ऊँचे शालवृक्षोंकी पंक्तियोंद्वारा यह श्रेष्ठ नगरी सब ओरसे घिरी हुई है। महामना राजा द्रुपदकी सभी प्रजा और प्रकृतियाँ (मन्त्री आदि) उनमें अनुराग रखती हैं। बाहर और भीतरके सभी कर्मचारियोंका दान और मानद्वारा सत्कार किया जाता है। प्रतिरुद्धांनिमाञ्ज्ञात्वा राजभिर्भीमविक्रमैः । उपयास्यन्ति दाशार्हाः समुदग्रोच्छ्रितायुधाः ॥ भयानक पराक्रमी राजाओंद्वारा पाण्डवोंको सब ओरसे घिरा हुआ जानकर समस्त यदुवंशी वीर प्रचण्ड अस्त्र-शस्त्र लिये यहाँ उपस्थित हो जायँगे। तस्मात् संधिं वयं कृत्वा धार्तराष्ट्रस्य पापडवैः । स्वराष्ट्रमेव गच्छामो यद्याप्तवचनं मम ॥ एतन्मम मतं सर्वैः क्रियतां यदि रोचते । एतद्धि सुकृतं मन्ये क्षेमं चापि महीक्षिताम् ॥ अतः हम धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधनकी पाण्डवोंके साथ संधि कराकर अपने राज्यमें ही लौट चलें। यदि आपलोगोंको मेरी बातपर विश्वास हो और मेरा यह मत सबको ठीक जँचता हो तो आप सब लोग इसे काममें लायें। हमारा यही सर्वोत्तम कर्तव्य है और मैं इसीको राजाओंके लिये कल्याणकारी मानता हूँ।

वृत्ते स्वयंवरे चैव राजानः सर्व एव ते । यथागतं विप्रजग्मुर्विदित्वा पाण्डवान् वृतान् ॥ ८ ॥ स्वयंवर समाप्त हो जानेपर जब यह ज्ञात हो गया कि द्रौपदीने पाण्डवोंका वरण किया है, तब वे सभी राजा जैसे आये थे, वैसे ही (अपने-अपने) देशको लौट गये ॥ ८ ॥ अथ दुर्योधनो राजा विमना भ्रातृभिः सह । अश्वत्थाम्ना मातुलेन कर्णेन च कृपेण च ॥ ९ ॥ विनिवृत्तो वृतं दृष्ट्वा द्रौपद्या श्वेतवाहनम् । तं तु दुःशासनो व्रीडन् मन्दं मन्दमिवाब्रवीत् ॥ १० ॥ द्रुपदकुमारी कृष्णाने श्वेतवाहन अर्जुनको (जयमाला पहनाकर उनका) वरण किया है, यह अपनी आँखों देखकर राजा दुर्योधनके मनमें बड़ा दुःख हुआ। वह अश्वत्थामा, मामा शकुनि, कर्ण, कृपाचार्य तथा अपने भाइयोंके साथ (द्रुपदकी राजधानीसे) हस्तिनापुरके लिये लौट पड़ा। मार्गमें दुःशासनने लज्जित होकर दुर्योधनसे धीरे-धीरे (इस प्रकार) कहा— ॥ ९-१० ॥ यद्यसौ ब्राह्मणो न स्याद् विन्देत द्रौपदीं न सः । न हि तं तत्त्वतो राजन् वेद कश्चिद् धनंजयम् ॥ ११ ॥ ‘भाईजी! यदि अर्जुन ब्राह्मणके वेशमें न होता तो वह कदापि द्रौपदीको न पा सकता था। राजन्! वास्तवमें किसीको यह पता ही नहीं चला कि वह अर्जुन है ॥ ११ ॥ दैवं च परमं मन्ये पौरुषं चाप्यनर्थकम् । धिगस्तु पौरुषं तात ध्रियन्ते यत्र पाण्डवाः ॥ १२ ॥ ‘मैं तो भाग्यको ही प्रबल मानता हूँ, पुरुषका प्रयत्न निरर्थक है। तात! हमारे पुरुषार्थको धिक्कार है, जब कि पाण्डव अभीतक जी रहे हैं’ ॥ १२ ॥ एवं सम्भाषमाणास्ते निन्दन्तश्च पुरोचनम् । विविशुर्हास्तिनपुरं दीना विगतचेतसः ॥ १३ ॥ इस प्रकार परस्पर बातें करते और पुरोचनको कोसते हुए वे सब कौरव दुःखी होकर हस्तिनापुरमें पहुँचे। (पाण्डवोंकी) सफलता देखकर, उनका चित्त ठिकाने न रहा ॥ १३ ॥ त्रस्ता विगतसंकल्पा दृष्ट्वा पार्थान् महौजसः । मुक्तान् हव्यभुजश्चैव संयुक्तान् द्रुपदेन च ॥ १४ ॥ धृष्टद्युम्नं तु संचिन्त्य तथैव च शिखण्डिनम् । द्रुपदस्यात्मजांश्चान्यान् सर्वयुद्धविशारदान् ॥ १५ ॥ महातेजस्वी कुन्तीकुमार लाक्षागृहकी आगसे जीवित बचकर राजा द्रुपदके सम्बन्धी हो गये, यह अपनी आँखों देखकर और धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा द्रुपदके अन्य पुत्र युद्धकी सम्पूर्ण कलाओंमें दक्ष हैं, इस बातका विचार करके कौरव बहुत डर गये। उनकी आशा निराशामें परिणत हो गयी ॥ १४-१५ ॥

विदुरस्त्वथ तां श्रुत्वा द्रौपदीं पाण्डवैर्वृताम् । व्रीडितान् धार्तराष्ट्रांश्च भग्नदर्पानुपागतान् ॥ १६ ॥ ततः प्रीतमनाः क्षत्ता धृतराष्ट्रं विशाम्पते । उवाच दिष्ट्या कुरवो वर्धन्त इति विस्मितः ॥ १७ ॥ विदुरजीने जब यह सुना कि पाण्डवोंने द्रौपदीको प्राप्त किया है और धृतराष्ट्रके पुत्र अपना अभिमान चूर्ण हो जानेसे लज्जित होकर लौट आये हैं, तब वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। राजन्! तब वे धृतराष्ट्रके पास जाकर विस्मयसूचक वाणीमें बोले—'महाराज! हमारा अहोभाग्य है, जो कौरववंशकी वृद्धि हो रही है ॥ १६-१७ ॥

वैचित्रवीर्यस्तु वचो निशम्य विदुरस्य तत् । अब्रवीत् परमप्रीतो दिष्ट्या दिष्ट्येति भारत ॥ १८ ॥ भारत! विचित्रवीर्यनन्दन राजा धृतराष्ट्र विदुरकी यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो सहसा बोल उठे—'अहोभाग्य, अहोभाग्य' ॥ १८ ॥ मन्यते स वृतं पुत्रं ज्येष्ठं द्रुपदकन्यया । दुर्योधनमविज्ञानात् प्रज्ञाचक्षुरनेश्वरः ॥ १९ ॥ उस अंधे नरेशने अज्ञानवश यह समझ लिया कि 'द्रुपदकन्याने मेरे ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधनका वरण किया है' ॥ १९ ॥ अथ त्वाज्ञापयामास द्रौपद्या भूषणं बहु । आनीयतां वै कृष्णेति पुत्रं दुर्योधनं तदा ॥ २० ॥