महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1389, कुल 2256 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुनर्जातानिव च तांस्तेऽमन्यन्त नराधिपाः ॥ ६ ॥ उन्होंने पहले सुन रखा था कि कुन्ती अपने पुत्रोंसहित लाक्षागृहमें जल गयी। अब उन्हें जीवित सुनकर वे राजालोग यह मानने लगे कि इन पाण्डवोंका फिर नया जन्म-सा हुआ है ॥ ६ ॥
धिगकुर्वंस्तदा भीष्मं धृतराष्ट्रं च कौरवम् । कर्मणातिनृशंसेन पुरोचनकृतेन वै ॥ ७ ॥ पुरोचनके किये हुए अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्मका स्मरण हो आनेसे उस समय सभी नरेश कुरुवंशी धृतराष्ट्र तथा भीष्मको धिक्कारने लगे ॥ ७ ॥
(धार्मिकान् वृत्तसम्पन्नान् मातुः प्रियहिते रतान् । यदा तानीदृशान् पार्थानुत्सादयितुमिच्छति ॥ ‘देखो न; धर्मात्मा, सदाचारी तथा माताके प्रिय एवं हितमें तत्पर रहनेवाले कुन्तीकुमारोंको भी यह धृतराष्ट्र नष्ट करना चाहता है (भला, इससे बढ़कर निन्दनीय कौन होगा)।'
ततः स्वयंवरे वृत्ते धार्तराष्ट्राः स्म भारत । मन्त्रयन्ते ततः सर्वे कर्णसौबलदूषिताः ॥ जनमेजय! उधर स्वयंवर समाप्त होनेपर धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जिन्हें कर्ण और शकुनिने बिगाड़ रखा था, इस प्रकार सलाह करने लगे।
शकुनिरुवाच
कश्चिच्छत्रुः कर्शनीयः पीडनीयस्तथापरः । उत्साद्नीयाः कौन्तेयाः सर्वे क्षत्रस्य मे मताः ॥ **शकुनि बोला—**संसारमें कोई शत्रु तो ऐसा होता है, जिसे सब प्रकारसे दुर्बल कर देना उचित है; दूसरा ऐसा होता है, जिसे सदा पीड़ा दी जाय। परंतु कुन्तीके ये सभी पुत्र तो समस्त क्षत्रियोंके लिये समूल नष्ट कर देनेयोग्य हैं। इनके विषयमें मेरा यही मत है।
एवं पराजिताः सर्वे यदि यूयं गमिष्यथ । अकृत्वा संविदं कांचिद् तद् वस्तप्स्यत्यसंशयम् ॥ यदि इस प्रकार पराजित होकर आप सब लोग इन (पाण्डवोंके विनाशकी) युक्ति निश्चित किये बिना ही चले जायँगे, तो अवश्य ही यह भूल आपलोगोंको सदा संतप्त करती रहेगी।
अयं देशश्च कालश्च पाण्डवोद्धरणाय नः । न चेदेवं करिष्यध्वं लोके हास्या भविष्यथ ॥ पाण्डवोंको जड़मूलसहित विनष्ट करनेके लिये हमारे सामने यही उपयुक्त देश और काल उपस्थित है। यदि आपलोग ऐसा नहीं करेंगे तो संसारमें उपहासके पात्र होंगे।