महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयमेते संश्रिता वस्तुं कामयन्ते च भूमिपम् । सोऽल्पवीर्यबलो राजा द्रुपदो वै मतो मम ॥ ये पाण्डव जिस राजाके आश्रयमें रहनेकी इच्छा रखते हैं, उस द्रुपदका बल और पराक्रम मेरी रायमें बहुत थोड़ा है।
यावदेतान् न जानन्ति जीवतो वृष्णिपुङ्गवाः । चैद्यश्च पुरुषव्याघ्रः शिशुपालः प्रतापवान् ॥ जबतक वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर यह नहीं जानते कि पाण्डव जीवित हैं, पुरुषसिंह चेदिराज प्रतापी शिशुपाल भी जबतक इस बातसे अनभिज्ञ है, तभीतक पाण्डवोंको मार डालना चाहिये।
एकीभावं गता राज्ञा द्रुपदेन महात्मना । दुराधर्षतरा राजन् भविष्यन्ति न संशयः ॥ राजन्! जब ये महात्मा राजा द्रुपदके साथ मिलकर एक हो जायँगे, तब इन्हें परास्त करना अत्यन्त कठिन हो जायगा, इसमें संशय नहीं है।
यावदत्वरतां सर्वे प्राप्नुवन्ति नराधिपाः । तावदेव व्यवस्यामः पाण्डवानां वधं प्रति ॥ जबतक सब राजा ढीले पड़े हैं, तभीतक हमें पाण्डवोंके वधके लिये पूरा प्रयत्न कर लेना चाहिये।
मुक्ता जतुगृहाद् भीमाद् आशीविषमुखादिव । पुनर्यदीह मुच्यन्ते महन्नो भयमाविशेत् ॥ विषधर सर्पके मुख-सदृश भयंकर लाक्षागृहसे तो वे बच ही गये हैं। यदि फिर यहाँ हमारे हाथसे छूट जाते हैं तो उनसे हमलोगोंको महान् भय प्राप्त हो सकता है।
तेषामिहोपयातानामेषां च पुरवासिनाम् । अन्तरे दुष्करं स्थातुं मेषयोर्महतोरिव ॥ यदि वे वृष्णिवंशी और चेदिवंशी वीर यहाँ आ जायँ और यहाँके नागरिक भी अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो जायँ तो इनके बीचमें खड़ा होना उतना ही कठिन होगा, जितना आपसमें लड़ते हुए दो विशाल मेढ़ोंके बीचमें ठहरना।
हलधृक्प्रगृहीतानि बलानि बलिनां स्वयं । यावन्न कुरुसेनायां पतन्ति पतगा इव ॥ तावत् सर्वाभिसारेण पुरमेतद् विनाशयताम् । एतदत्र परं मन्ये प्राप्तकालं नरर्षभाः ॥ जबतक हल धारण करनेवाले बलरामजीके द्वारा संचालित बलवान् योद्धाओंकी सेनाएँ स्वयं ही आकर कौरवसेनारूपी खेतीपर टिड्डियोंकी भाँति न टूट पड़ें, तबतक हम सब लोग