महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअभिषेकोदकक्लिन्नं सर्वाभरणभूषितम् । औपवाह्योपरिगतं दिव्यचामरवीजितम् ॥ सुवर्णमणिचित्रेण श्वेतच्छत्रेण शोभितम् । जयेति द्विजवाक्येन स्तूयमानं नृपैस्तथा ॥ दृष्ट्वा कुन्तीसुतं ज्येष्ठमाजमीढं युधिष्ठिरम् । प्रीताः प्रीतेन मनसा प्रशंसन्तु पुरे जनाः ॥ पाण्डोः कृतोपकारस्य राज्यं दत्त्वा ममैव च । प्रतिक्रियाकृतमिदं भविष्यति न संशयः ॥ (फिर) धृतराष्ट्रने (विदुरसे) कहा—विदुर! तुम राज्याभिषेककी सामग्री लाओ, इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये। मैं आज ही कुरुकुलनन्दन युधिष्ठिरका अभिषेक करूँगा। वेदवेत्ता विद्वानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण, नगरके सभी प्रमुख व्यापारी, प्रजावर्गके लोग और विशेषतः बन्धु-बान्धव बुलाये जायें। तात! पुण्याहवाचन कराओ और ब्राह्मणोंको दक्षिणाके साथ एक सहस्र गौएँ तथा मुख्य-मुख्य ग्राम दो। विदुर! दो भुजबंद, एक सुन्दर मुकुट तथा हाथके आभूषण मँगाओ। मोतीकी कई मालाएँ, हार, पदक, कुण्डल, करधनी, कटिसूत्र तथा उदरबन्ध भी ले आओ। एक हजार आठ हाथी मँगाओ, जिनपर ब्राह्मण सवार हों। पुरोहितोंके साथ जाकर वे हाथी शीघ्र गंगाजीका जल ले आयें। युधिष्ठिर अभिषेकके जलसे भीगे हों, समस्त आभूषणोंसे उन्हें विभूषित किया गया हो, वे राजाकी सवारीके योग्य गजराजपर बैठे हों, उनपर दिव्य चँवर ढुल रहे हों और उनके मस्तकके ऊपर सुवर्ण और मणियोंसे विचित्र शोभा धारण करनेवाला श्वेत छत्र सुशोभित हो, ब्राह्मणोंद्वारा की हुई जय-जयकारके साथ बहुत-से नरेश उनकी स्तुति करते हों। इस प्रकार कुन्तीके ज्येष्ठ पुत्र अजमीढकुलतिलक युधिष्ठिरका प्रसन्नमनसे दर्शन करके प्रसन्न हुए पुरवासीजन इनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करें। राजा पाण्डुने मुझे ही अपना राज्य देकर जो उपकार किया था, उसका बदला इसीसे पूर्ण होगा कि युधिष्ठिरका राज्याभिषेक कर दिया जाय; इसमें संशय नहीं है।
वैशम्पायन उवाच
भीष्मो द्रोणः कृपः क्षत्ता साधु साध्वित्यभाषत । वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! यह सुनकर भीष्म, द्रोण, कृप तथा विदुरने कहा—'बहुत अच्छा! बहुत अच्छा!'
श्रीवासुदेव उवाच
युक्तमेतन्महाराज कौरवाणां यशस्करम् । शीघ्रमद्यैव राजेन्द्र यथोक्तं कर्तुमर्हसि ॥